दोस्तों, पूरे यकीन के साथ कह रहा हूं कि ब्लागर साथियों के साथ काफी कुछ गलत हो रहा है। यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि टॉप लिस्ट में शामिल होने के लिए कई लोग किस तरह की लामबंदी और गिरोहबंदी कर रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से मेरे साथ जो हो रहा है, वह सबके साथ बांटना चाहता हूं। अभी शनिवार की बात है। मैंने एक ब्लाग को पसंद किया तो वह -2 (माइनस 2) हो गया। यानि यह बताया गया कि इस ब्लाग को दो लोगों ने नापसंद किया है। जबकि इससे पहले पसंद या नापसंद शून्य बता रहा था।) पसंद के बाद माइनस में जाना मुझे समझ में नहीं आया। कल भी मैंने एक ब्लागर का चिट्ठा जब पसंद किया (जिसे पहले से ही 3 लोगों ने पसंद किया था) तो भी मेरी पसंद नकारात्मक गई। जबकि मैं यह बेहतर जानता हूं कि चिट्ठे को पसंद कैसे किया जाता है और नापसंद कैसे? मंगलवार शाम को जब मैंने एक घटिया किस्म के ब्लाग को नापसंद किया तो आश्चर्यजनक रूप से दो अंक प्लस में चला गया। ब्लाग जगत के दिग्गजों से मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या ऐसा भी हो सकता है? कृपया मुझे बताएं कि पसंद करने वाले नापसंद और नापसंद करने वाले पसंद कैसे बन रहे हैं।
एक बात और बताना चाहूंगा। एक महिला के जब मैंने टिप्पणी भेजी तो संदेश आया कि आप इस ब्लाग पर संदेश नहीं भेज सकते। जबकि मैंने उस महिला की पंक्तियों को सराहा था। क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ लोग अपने ब्लाग में ऐसे ईमेल डालकर रखें, जिनकी टिप्पणी प्रकाशित ही न हो पाए? इससे पहले एक सज्जन के साथ भी मेरा यही अनुभव रहा है और मजे की बात यह है कि यह दोनों एक दूसरे के साथ हैं। इसे क्या माना जाए?
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मंगलवार, 11 मई 2010
सोमवार, 10 मई 2010
चेंदरू के बेटे को शिक्षक बना दो
(नरेश सोनी)
क्या आप चेंदरू को जानते हैं? सवाल अजीब लग सकता है - कौन चेंदरू? 1960 के दशक में एक 10 साल का माडिय़ा आदिवासी अंतरराष्ट्रीय नायक बनकर उभरा था। चेंदरू पर स्वीडिश फिल्मकार अर्ने सुकेड्राफ की पत्नी एस्ट्राइड सुकेड्राफ ने एक किताब लिखी थी। इस किताब का विलियन सैमसंग ने अंग्रेजी अनुवाद किया। बाद में अर्ने ने 10 साल के चेंदरू के जीवन का पूरे 2 साल तक फिल्मांकन किया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चेंदरू और उसका शेर नामक यह फिल्म बेहद कामयाब रही। जिसके बाद किसी अबूझमाडिय़ा को पहली बार विदेश जाने का भी अवसर मिला। बाद में फ्रांस में भी चेंदरू एट सन टाइगर नाम की पुस्तक छपी। अमेरिका में भी इसी दौरान चेंदरू : द ब्वाय एंड द टाइगर के नाम से किताब प्रकाशित हुई। अभी कुछ समय पहले ही चेंदरू और उसके जीवन पर एक समाचार चैनल ने घंटेभर का विशेष कार्यक्रम भी प्रसारित किया था और उसकी वर्तमान बुरी हालत की परतें खोली थी। अबूझमाड़ के इसी चेंदरू का बेटा शिक्षक बनना चाहता है।
चेंदरू की कहानी विदेशों में शायद इसीलिए पहचान बना पाई कि एक 10 साल के लड़के का दोस्त एक व्यस्क शेर था। चेंदरू सारा दिन इसी शेर के साथ जंगलों में घूमता, शिकार करता। शायद विदेशों में इस कहानी की लोकप्रियता टारजन जैसी फिल्मों की वजह से हुई। टारजन को काल्पनिक पात्र माना जाता है, लेकिन भारत के बेहद पिछड़े परिवेश में एक वास्तविक टारजन का हीरो बन जाना वाकई चकित करने वाला है। चेंदरू तो अनपढ़ था, किन्तु उसने अपने बच्चों को पढ़ाया। उसका बेटा जयराम शिक्षाकर्मी बनना चाहता है। वह बस्तर जैसे पिछड़े इलाके खासकर अबूझमाड़ में शिक्षा की अलख जगाने का इच्छुक है। वैसे, एक नंगी सच्चाई यह भी है कि नारायणपुर जिले के गड़बेंगाल में रहने वाले चेंदरू का परिवार दो जून की रोटी का भी मोहताज है। समाचार चैनल में चेंदरू की लम्बी स्टोरी चलने के बाद बस्तर के प्रभारी मंत्री केदार कश्यप ने चेंदरू को 25 हजार रूपए का अनुदान दिया था। लेकिन उसके बाद से कभी, किसी ने इस परिवार की सुध नहीं ली। जबकि नारायणपुर जिले का अबूझमाड़ ही वह क्षेत्र है, जो सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित है। सरकार ने इस क्षेत्र के शिक्षिक बेरोजगारों को सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया था, लेकिन यह ऐलान जमीन पर आकर कब का दम तोड़ चुका है। एक ओर जहां बस्तर के भीतरी इलाकों में जाकर कोई काम करना नहीं चाहता तो दूसरी ओर इच्चुक स्थानीय लोग ही उपेक्षित हैं। इस विडंबना से पार पाना बड़ी चुनौती है।
क्या आप चेंदरू को जानते हैं? सवाल अजीब लग सकता है - कौन चेंदरू? 1960 के दशक में एक 10 साल का माडिय़ा आदिवासी अंतरराष्ट्रीय नायक बनकर उभरा था। चेंदरू पर स्वीडिश फिल्मकार अर्ने सुकेड्राफ की पत्नी एस्ट्राइड सुकेड्राफ ने एक किताब लिखी थी। इस किताब का विलियन सैमसंग ने अंग्रेजी अनुवाद किया। बाद में अर्ने ने 10 साल के चेंदरू के जीवन का पूरे 2 साल तक फिल्मांकन किया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चेंदरू और उसका शेर नामक यह फिल्म बेहद कामयाब रही। जिसके बाद किसी अबूझमाडिय़ा को पहली बार विदेश जाने का भी अवसर मिला। बाद में फ्रांस में भी चेंदरू एट सन टाइगर नाम की पुस्तक छपी। अमेरिका में भी इसी दौरान चेंदरू : द ब्वाय एंड द टाइगर के नाम से किताब प्रकाशित हुई। अभी कुछ समय पहले ही चेंदरू और उसके जीवन पर एक समाचार चैनल ने घंटेभर का विशेष कार्यक्रम भी प्रसारित किया था और उसकी वर्तमान बुरी हालत की परतें खोली थी। अबूझमाड़ के इसी चेंदरू का बेटा शिक्षक बनना चाहता है।
चेंदरू की कहानी विदेशों में शायद इसीलिए पहचान बना पाई कि एक 10 साल के लड़के का दोस्त एक व्यस्क शेर था। चेंदरू सारा दिन इसी शेर के साथ जंगलों में घूमता, शिकार करता। शायद विदेशों में इस कहानी की लोकप्रियता टारजन जैसी फिल्मों की वजह से हुई। टारजन को काल्पनिक पात्र माना जाता है, लेकिन भारत के बेहद पिछड़े परिवेश में एक वास्तविक टारजन का हीरो बन जाना वाकई चकित करने वाला है। चेंदरू तो अनपढ़ था, किन्तु उसने अपने बच्चों को पढ़ाया। उसका बेटा जयराम शिक्षाकर्मी बनना चाहता है। वह बस्तर जैसे पिछड़े इलाके खासकर अबूझमाड़ में शिक्षा की अलख जगाने का इच्छुक है। वैसे, एक नंगी सच्चाई यह भी है कि नारायणपुर जिले के गड़बेंगाल में रहने वाले चेंदरू का परिवार दो जून की रोटी का भी मोहताज है। समाचार चैनल में चेंदरू की लम्बी स्टोरी चलने के बाद बस्तर के प्रभारी मंत्री केदार कश्यप ने चेंदरू को 25 हजार रूपए का अनुदान दिया था। लेकिन उसके बाद से कभी, किसी ने इस परिवार की सुध नहीं ली। जबकि नारायणपुर जिले का अबूझमाड़ ही वह क्षेत्र है, जो सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित है। सरकार ने इस क्षेत्र के शिक्षिक बेरोजगारों को सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया था, लेकिन यह ऐलान जमीन पर आकर कब का दम तोड़ चुका है। एक ओर जहां बस्तर के भीतरी इलाकों में जाकर कोई काम करना नहीं चाहता तो दूसरी ओर इच्चुक स्थानीय लोग ही उपेक्षित हैं। इस विडंबना से पार पाना बड़ी चुनौती है।
मंगलवार, 4 मई 2010
जहर चाटने के बाद छटपटाते रमन
- नरेश सोनी -
सामान्य बुद्धि का कोई भी व्यक्ति यह बेहतर जानता है कि जहर का सेवन कितना घातक होता है। शायद इसीलिए कांग्रेस इस जहर को चाटने से बचती रही है। उसे यह भलीभांति मालूम था और है कि इससे मौत भी हो सकती है। लेकिन छत्तीसगढ़ की नब्ज पर हाथ धरे बैठे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को शायद यह मालूम नहीं था कि 'यह गरल कितनी छटपटाहट देगा? नतीजतन उन्होंने यह गरल धारण कर लिया और अब जाहिर है कि परेशान हो रहे हैं।
मामला सिंह बनाम सिंह का है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के एक लेख का सार यह निकला कि वे अपनी ही केन्द्र सरकार के गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की नक्सल नीतियों से सहमत नहीं है। मसला क्योंकि छत्तीसगढ़ से भी जुड़ा था, इसलिए यहां के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का लाल-पीला होना लाजिमी था। तो बात यहां तक पहुंची कि डॉ. सिंह ने भी अखबारों में अपना लम्बा-चौड़ा लेख छपवा लिया। इस लम्बे-चौड़े लेख की भाषा से दिग्विजय सिंह ने असहमति जाहिर की और डॉ. रमन सिंह को एक पत्र लिख मारा। बस, छत्तीसगढ़ में अभी यही सब कुछ चल रहा है। दिग्विजय सिंह खुली चर्चा की चुनौती दे रहे हैं और डॉ. रमन सिंह उसे स्वीकार कर रहे हैं। दरअसल, डॉ. रमन सिंह 6 वर्षों से छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद के खात्मे के लिए प्रयासरत् रहे हैं। इसके लिए उन्हें लम्बी जुगत भी लगानी पड़ी। सबसे बड़ी समस्या जनमत तैयार करने की थी। इससे भी बड़ी समस्या केन्द्रीय मदद लेना थी। लेकिन केन्द्र सरकार नक्सलवाद को बड़ी समस्या मानने से ही हिचकती रही। तो सबसे पहले तो नक्सलवाद को सबसे बड़ी चुनौती साबित करना ही समस्या थी। इसमें कामयाबी मिली तो केन्द्र से मदद के दरवाजे खुल गए और नक्सलियों के खात्मे की तैयारियां भी शुरू हो गई। ऐसे में नक्सलियों का बौखलाना लाजिमी था। नतीजतन सलवा जुड़ूम से जुड़े लोगों, जवानों का कत्लेआम शुरू हो गया।
क्या कोई भी लड़ाई बिना कुर्बानी के नतीजे तक पहुंच सकती है? कांग्रेस ने लड़ाई लडऩे का कभी मन ही नहीं बनाया। वह कुर्बानियों से डरती रही। नतीजतन नक्सली फलते-फूलते और अपने को मजबूत करते रहे।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद ने गहरी जड़ें काफी पहले ही जमा ली थी। लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश की तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार हो या विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी, दोनों ने ही इन जड़ों को काटने के बजाए इससे परहेज करना ज्यादा मुनासिब समझा। यही वजह रही कि कांग्रेस के इस 10 वर्षीय (7 साल दिग्विजय सिंह, 3 साल अजीत जोगी) कार्यकाल में नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती रही और अपने आपको मजबूत करती रही। इस दौरान क्योंकि बस्तर के भीतरी इलाकों तक सरकार की पहुंच नहीं बन पाई (या फिर जानबूझकर इस इलाके को छुआ ही नहीं गया) इसलिए धीरे-धीरे पूरा बस्तर नक्सलियों की जद में आ गया। छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. रमन सिंह के सामने सिर्फ दो ही मसले थे। पहला राज्य का विकास और दूसरा नक्सलवाद से निपटने की चुनौती।
कई लोग यह सवाल उठाते रहे हैं कि जब राज्य में सब कुछ 'ठीक-ठाक चल रहा था तो नक्सलियों को 'उंगली क्यों की गई? पर यहां इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि नक्सलवाद कभी सामाजिक समस्या थी, पर बदलाव के साथ अब यह आपराधिक चुनौती बन चुकी है। किसी अपराधी का विरोध नहीं करने पर वह अपने को मजबूत करता चला जाता है और फिर कोई भी उससे बच नहीं पाता। नक्सलियों ने बस्तर के बीहड़ों से बाहर निकलकर शहरी क्षेत्रों में भी पैर पसारना शुरू कर दिया था। ऐसे में यदि डॉ. रमन सिंह की सरकार मुश्तैद नहीं होती तो नक्सली, शहरों में चुनौती देने की स्थिति में आ गए होते। राजधानी रायपुर भी नक्सलियों की आमद से अछूती नहीं रह गई थी। राजधानी के अलावा दुर्ग-भिलाई, राजनांदगांव, धमतरी जैसे इलाकों में नक्सलियों की धरपकड़ यह जाहिर करती है कि उनके मंसूबे क्या रहे होंगे। इसलिए कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से सहमति जाहिर करने से पहले यह भी विचार करना चाहिए कि नक्सलवाद जल्द ही शहरी क्षेत्रों के लिए भी चुनौती साबित होने जा रहा था। जिस बड़े पैमाने पर शहरों से असलहा बरामद हुआ और नक्सलियों के प्रवक्ता के भिलाई में रहने की सूचना मिली, उसका क्या मतलब था?
००००
सामान्य बुद्धि का कोई भी व्यक्ति यह बेहतर जानता है कि जहर का सेवन कितना घातक होता है। शायद इसीलिए कांग्रेस इस जहर को चाटने से बचती रही है। उसे यह भलीभांति मालूम था और है कि इससे मौत भी हो सकती है। लेकिन छत्तीसगढ़ की नब्ज पर हाथ धरे बैठे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को शायद यह मालूम नहीं था कि 'यह गरल कितनी छटपटाहट देगा? नतीजतन उन्होंने यह गरल धारण कर लिया और अब जाहिर है कि परेशान हो रहे हैं।
मामला सिंह बनाम सिंह का है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के एक लेख का सार यह निकला कि वे अपनी ही केन्द्र सरकार के गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की नक्सल नीतियों से सहमत नहीं है। मसला क्योंकि छत्तीसगढ़ से भी जुड़ा था, इसलिए यहां के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का लाल-पीला होना लाजिमी था। तो बात यहां तक पहुंची कि डॉ. सिंह ने भी अखबारों में अपना लम्बा-चौड़ा लेख छपवा लिया। इस लम्बे-चौड़े लेख की भाषा से दिग्विजय सिंह ने असहमति जाहिर की और डॉ. रमन सिंह को एक पत्र लिख मारा। बस, छत्तीसगढ़ में अभी यही सब कुछ चल रहा है। दिग्विजय सिंह खुली चर्चा की चुनौती दे रहे हैं और डॉ. रमन सिंह उसे स्वीकार कर रहे हैं। दरअसल, डॉ. रमन सिंह 6 वर्षों से छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद के खात्मे के लिए प्रयासरत् रहे हैं। इसके लिए उन्हें लम्बी जुगत भी लगानी पड़ी। सबसे बड़ी समस्या जनमत तैयार करने की थी। इससे भी बड़ी समस्या केन्द्रीय मदद लेना थी। लेकिन केन्द्र सरकार नक्सलवाद को बड़ी समस्या मानने से ही हिचकती रही। तो सबसे पहले तो नक्सलवाद को सबसे बड़ी चुनौती साबित करना ही समस्या थी। इसमें कामयाबी मिली तो केन्द्र से मदद के दरवाजे खुल गए और नक्सलियों के खात्मे की तैयारियां भी शुरू हो गई। ऐसे में नक्सलियों का बौखलाना लाजिमी था। नतीजतन सलवा जुड़ूम से जुड़े लोगों, जवानों का कत्लेआम शुरू हो गया।
क्या कोई भी लड़ाई बिना कुर्बानी के नतीजे तक पहुंच सकती है? कांग्रेस ने लड़ाई लडऩे का कभी मन ही नहीं बनाया। वह कुर्बानियों से डरती रही। नतीजतन नक्सली फलते-फूलते और अपने को मजबूत करते रहे।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद ने गहरी जड़ें काफी पहले ही जमा ली थी। लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश की तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार हो या विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी, दोनों ने ही इन जड़ों को काटने के बजाए इससे परहेज करना ज्यादा मुनासिब समझा। यही वजह रही कि कांग्रेस के इस 10 वर्षीय (7 साल दिग्विजय सिंह, 3 साल अजीत जोगी) कार्यकाल में नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती रही और अपने आपको मजबूत करती रही। इस दौरान क्योंकि बस्तर के भीतरी इलाकों तक सरकार की पहुंच नहीं बन पाई (या फिर जानबूझकर इस इलाके को छुआ ही नहीं गया) इसलिए धीरे-धीरे पूरा बस्तर नक्सलियों की जद में आ गया। छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. रमन सिंह के सामने सिर्फ दो ही मसले थे। पहला राज्य का विकास और दूसरा नक्सलवाद से निपटने की चुनौती।
कई लोग यह सवाल उठाते रहे हैं कि जब राज्य में सब कुछ 'ठीक-ठाक चल रहा था तो नक्सलियों को 'उंगली क्यों की गई? पर यहां इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि नक्सलवाद कभी सामाजिक समस्या थी, पर बदलाव के साथ अब यह आपराधिक चुनौती बन चुकी है। किसी अपराधी का विरोध नहीं करने पर वह अपने को मजबूत करता चला जाता है और फिर कोई भी उससे बच नहीं पाता। नक्सलियों ने बस्तर के बीहड़ों से बाहर निकलकर शहरी क्षेत्रों में भी पैर पसारना शुरू कर दिया था। ऐसे में यदि डॉ. रमन सिंह की सरकार मुश्तैद नहीं होती तो नक्सली, शहरों में चुनौती देने की स्थिति में आ गए होते। राजधानी रायपुर भी नक्सलियों की आमद से अछूती नहीं रह गई थी। राजधानी के अलावा दुर्ग-भिलाई, राजनांदगांव, धमतरी जैसे इलाकों में नक्सलियों की धरपकड़ यह जाहिर करती है कि उनके मंसूबे क्या रहे होंगे। इसलिए कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से सहमति जाहिर करने से पहले यह भी विचार करना चाहिए कि नक्सलवाद जल्द ही शहरी क्षेत्रों के लिए भी चुनौती साबित होने जा रहा था। जिस बड़े पैमाने पर शहरों से असलहा बरामद हुआ और नक्सलियों के प्रवक्ता के भिलाई में रहने की सूचना मिली, उसका क्या मतलब था?
००००
सोमवार, 12 अप्रैल 2010
सरकार को कौन बर्खास्त करे
- नरेश सोनी -
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस ने सोमवार से राज्य की डॉ. रमन सिंह सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इससे पहले उसने अपनी ही पार्टी की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार से मांग की थी कि इस सरकार को बर्खास्त कर दिया जाए। हालांकि केन्द्र सरकार ने इस मांग को सिरे से इस आधार पर खारिज कर दिया था कि नक्सल विरोधी अभियान केन्द्र की अगुवाई में ही चल रहा है। बावजूद इसके यदि कांग्रेस ने प्रदेश सरकार को बर्खास्त करने और जनमत तैयार करने के उद्देश्य से अभियान शुरू कर दिया है तो इसे सीधे-सीधे पार्टी हाईकमान के खिलाफ खोला गया मोर्चा कहना अतिशंयोक्तिपूर्ण नहीं होगा।
प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष धनेन्द्र साहू समेत कई कांग्रेसियों ने प्रदेश की डॉ. रमन सिंह सरकार को बर्खास्त करने की मांग की थी। इन कांग्रेसियों का तर्क था कि प्रदेश सरकार लोगों के जान-माल की रक्षा करने में समर्थ नहीं है और यहां कानून व्यवस्था की स्थिति भी ठीक नहीं है। इस आधार पर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाना चाहिए। लेकिन प्रदेश के कांग्रेसियों की इस मांग को पहले केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने और उसके बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी ठुकरा दिया। उनका कहना था कि 76 जवानों की नक्सलियों द्वारा की गई नृशंस हत्या के बाद यह मांग इसलिए भी जायज नहीं है कि क्योंकि नक्सलियों के खिलाफ केन्द्र सरकार की ही पहल पर संयुक्त अभियान शुरू हुआ है। दिल्ली से आए इस बयान के बाद प्रदेश अध्यक्ष साहू ने प्रदेशव्यापी अभियान चलाने की बात कही थी। इसी के तहत कांग्रेस का सरकार विरोधी अभियान शुरू हो गया।
दरअसल, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जो बुरी हालत हुई है, उससे पीछा छुड़ाना लगातार भारी पड़ता रहा है। लचर संगठन और नाक के ऊपर चढ़ आया गुटबाजी का पानी, पार्टी को डुबाने को आतुर है। राज्य के दिग्गज कांग्रेसी मोतीलाल वोरा, दिल्ली की राजनीति में इतने रम गए हैं कि उन्होंने छत्तीसगढ़ से ही किनारा कर लिया। ऐसे में अजीत जोगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद हालात इस कदर बिगड़े कि अब तक नहीं सुधर पाए हैं। तब से लेकर अब तक दो बार विधानसभा और इतनी ही बार लोकसभा के चुनाव हुए, लेकिन कांग्रेस का परफारमेंस बेहद निराशाजनक रहा। हद तो कुछ महीनों पहले सम्पन्न हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में हो गई, जहां शहरियों की पार्टी कहलाने वाली भाजपा ने अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस को पीछे ढकेल दिया। वास्तव में, प्रदेश कांग्रेस के साथ एक विडंबना है कि उसके अध्यक्ष तो लगातार बदलते रहे, लेकिन इन अध्यक्षों को मनमाफिक कार्यकारिणी बनाने की छूट नहीं दी गई। प्रदेश कांग्रेस में अब भी बरसों पुरानी कार्यकारिणी काम कर रही है। अब जबकि संगठन चुनाव की गतिविधियां चल रही है, इस बात की संभावना मजबूत हुई है कि संगठनात्मक चुनाव के बाद पार्टी का कुछ भला हो पाएगा, लेकिन यह तब होगा, जब एनएसयूआई या वर्तमान में युवक कांग्रेस की तरह गुटबाजी न हो। फिलहाल, संगठन पर कब्जे के लिए जिस तरह की पैतरेबाजी चल रही है, वह भी कम नुकसानदायक नहीं होगी।
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस ने सोमवार से राज्य की डॉ. रमन सिंह सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इससे पहले उसने अपनी ही पार्टी की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार से मांग की थी कि इस सरकार को बर्खास्त कर दिया जाए। हालांकि केन्द्र सरकार ने इस मांग को सिरे से इस आधार पर खारिज कर दिया था कि नक्सल विरोधी अभियान केन्द्र की अगुवाई में ही चल रहा है। बावजूद इसके यदि कांग्रेस ने प्रदेश सरकार को बर्खास्त करने और जनमत तैयार करने के उद्देश्य से अभियान शुरू कर दिया है तो इसे सीधे-सीधे पार्टी हाईकमान के खिलाफ खोला गया मोर्चा कहना अतिशंयोक्तिपूर्ण नहीं होगा।
प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष धनेन्द्र साहू समेत कई कांग्रेसियों ने प्रदेश की डॉ. रमन सिंह सरकार को बर्खास्त करने की मांग की थी। इन कांग्रेसियों का तर्क था कि प्रदेश सरकार लोगों के जान-माल की रक्षा करने में समर्थ नहीं है और यहां कानून व्यवस्था की स्थिति भी ठीक नहीं है। इस आधार पर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाना चाहिए। लेकिन प्रदेश के कांग्रेसियों की इस मांग को पहले केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने और उसके बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी ठुकरा दिया। उनका कहना था कि 76 जवानों की नक्सलियों द्वारा की गई नृशंस हत्या के बाद यह मांग इसलिए भी जायज नहीं है कि क्योंकि नक्सलियों के खिलाफ केन्द्र सरकार की ही पहल पर संयुक्त अभियान शुरू हुआ है। दिल्ली से आए इस बयान के बाद प्रदेश अध्यक्ष साहू ने प्रदेशव्यापी अभियान चलाने की बात कही थी। इसी के तहत कांग्रेस का सरकार विरोधी अभियान शुरू हो गया।
दरअसल, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जो बुरी हालत हुई है, उससे पीछा छुड़ाना लगातार भारी पड़ता रहा है। लचर संगठन और नाक के ऊपर चढ़ आया गुटबाजी का पानी, पार्टी को डुबाने को आतुर है। राज्य के दिग्गज कांग्रेसी मोतीलाल वोरा, दिल्ली की राजनीति में इतने रम गए हैं कि उन्होंने छत्तीसगढ़ से ही किनारा कर लिया। ऐसे में अजीत जोगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद हालात इस कदर बिगड़े कि अब तक नहीं सुधर पाए हैं। तब से लेकर अब तक दो बार विधानसभा और इतनी ही बार लोकसभा के चुनाव हुए, लेकिन कांग्रेस का परफारमेंस बेहद निराशाजनक रहा। हद तो कुछ महीनों पहले सम्पन्न हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में हो गई, जहां शहरियों की पार्टी कहलाने वाली भाजपा ने अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस को पीछे ढकेल दिया। वास्तव में, प्रदेश कांग्रेस के साथ एक विडंबना है कि उसके अध्यक्ष तो लगातार बदलते रहे, लेकिन इन अध्यक्षों को मनमाफिक कार्यकारिणी बनाने की छूट नहीं दी गई। प्रदेश कांग्रेस में अब भी बरसों पुरानी कार्यकारिणी काम कर रही है। अब जबकि संगठन चुनाव की गतिविधियां चल रही है, इस बात की संभावना मजबूत हुई है कि संगठनात्मक चुनाव के बाद पार्टी का कुछ भला हो पाएगा, लेकिन यह तब होगा, जब एनएसयूआई या वर्तमान में युवक कांग्रेस की तरह गुटबाजी न हो। फिलहाल, संगठन पर कब्जे के लिए जिस तरह की पैतरेबाजी चल रही है, वह भी कम नुकसानदायक नहीं होगी।
मंगलवार, 30 मार्च 2010
सरोज पाण्डेय होने के मायने
- नरेश सोनी -
भिलाई जैसे छोटे से क्षेत्र से राजनीति की शुरूआत करने वाली सरोज पाण्डेय आज दुर्ग संसदीय क्षेत्र की सांसद हैं और भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सचिव बनाई गई हैं। भारतीय जनता पार्टी ने जब उन्हें भिलाई से दुर्ग लाकर महापौर का टिकट दिया था, तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह सरोज इतने लम्बे समय तक खिला भी रह सकता है और न सिर्फ खिला रह सकता है बल्कि और लोगों को भी पल्लवित-पुष्पित करने में सहायक होगा। आज सांसद सरोज की पहचान एक मुखर वक्ता और बेहतरीन नेतृत्वकत्र्ता की है और शायद यही वजह है कि वे छत्तीसगढ़ की कद्दावर नेताओं में गिनीं जानें लगी हैं।
महापौर के अपने दस वर्षों के दो कार्यकाल में दुर्ग शहर का चेहरा बदलने वाली सरोज इस दौरान वैशाली नगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक और दुर्ग लोकसभा से सांसद भी निर्वाचित हुईं। ऐसे बिरले ही लोग होते हैं, जिन्हें इतने कम समय में ऐसी उपलब्धियां हासिल हों। जिस सरोज को महापौर का टिकट दिए जाने पर दुर्ग में विरोध के पुरजोर स्वर उभरे, आज उस दुर्ग में उनके समर्थकों की संख्या इस बात की गवाह है कि सरोज पाण्डेय होने के क्या मायने हैं।
बात सिर्फ सरोज पाण्डेय की उपलब्धियों और समर्थकों की संख्या तक ही नहीं है। इन दस वर्षों में जितने लोगों ने उन्हें समर्थन दिया, आज वे सत्ता या संगठन के अहम् पदों पर हैं। भाजपा या कांग्रेस में इस तरह की क्रांति पहले कभी नहीं आई। प्रत्येक उस नेता ने जिसका कद बढ़ गया, अपने समर्थकों को सिर्फ समर्थक तक ही सीमित रखा। उन्हें आगे बढ़ाने में कभी सहयोग नहीं किया। मोतीलाल वोरा और चंदूलाल चंद्राकर से लेकर दुर्ग जिले की राजनीति के अग्रज रहे चौबे बंधुओं के उदाहरण कांग्रेस में मौजूद हैं तो भाजपा में पूर्व सांसद ताराचंद साहू से लेकर वर्तमान में केबिनेट मंत्री हेमचंद यादव तक के नाम हैं। कांग्रेस के बनिस्बत् भाजपा का राजनीतिक सफर छोटा जरूर रहा है लेकिन दोनों ही पार्टियों में हालात् एक जैसे रहे। मोतीलाल वोरा के लिए तन, मन और धन लगाने वाले लोग लम्बे समय तक हाशिए पर रहे। वोरा की विरासत जब उनके पुत्र अरूण वोरा ने संभाली तो इन समर्थकों के समझ में आया कि अपनी जिंदगी वोरा परिवार को समर्पित करने के बाद उनके हाथ अब यह आया है कि वे पिता के बाद पुत्र की सेवा करें। नतीजतन वोरा के समर्थकों की संख्या बेहद तेजी से गिरी और वोरा की विरासत संभालने वाले उनके पुत्र अरूण वोरा तीन बार विधानसभा का चुनाव हार गए। तब जाकर मोतीलाल वोरा को समझ आया कि गड़बड़ कहां हो रही है। अब वे अपनी पुरानी गलतियों को सुधारने में लगे हैं। अपने एक करीबी समर्थक भजनसिंह निरंकारी को उन्होंने वैशाली नगर विधानसभा का टिकट दिलवाया तो एक अन्य समर्थक शंकरलाल ताम्रकार को दुर्ग से महापौर का टिकट दिलवाया। यह तो रही कांग्रेस की बात। लेकिन भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही। उसके 5 बार के सांसद ताराचंद साहू हमेशा अपने बंगले में कैद रहे और जातीयवादी राजनीति को बढ़ावा देते रहे। उनका कोई समर्थक खास मुकाम हासिल नहीं कर पाया। यहां तक कि साहू ने कभी अपने लोगों को संगठन में भी महत्व दिलवाना मुनासिब नहीं समझा।
तत्कालीन विधानसभा के अध्यक्ष और भिलाई के विधायक प्रेमप्रकाश पाण्डेय ने उनके खिलाफ मोर्चा खोला तब जाकर उन्हें भी अहसास हुआ कि सांसद होने के बावजूद वे किस जगह पर खड़े हैं। और इसी के बाद पहले अघोषित और फिर घोषित तौर पर युद्ध प्रारम्भ हो गया। इस युद्ध का नतीजा ताराचंद साहू को पार्टी से निष्कासन के रूप में भोगना पड़ा और अब वे छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच नाम के एक संगठन के बैनर तले अपने समर्थकों को एकजुट करने में लगे हैं। यह हालात कमोबेश वैसे ही हैं, जैसे मोतीलाल वोरा के साथ रहे। पद पर रहते और सत्तासुख भोगते इन्हें कभी अपने समर्थकों की याद नहीं आई। उन्होंने अपने तमाम समर्थकों के बावजूद अपने एक नौसिखिए पुत्र को साजा विधानसभा से टिकट दिलवाई तो पार्टी से बगावत कर अपनी पुत्री झमिता साहू को जिला पंचायत का अध्यक्ष बनवाया। उन्होंने जो कुछ किया, अपने और अपने परिवार के लिए।
दुर्ग से तीन बार विधायक और दो बार के केबिनेटमंत्री हेमचंद यादव भी मोतीलाल वोरा और ताराचंद साहू की राह पर हैं। सुख और आराम के तलबगार इस मंत्री को लेकर तरह-तरह की बातें होती है, बावजूद इसके अज्ञात कारणों से उन्हें साफ-सुथरी छवि का लबादा ओढ़ाया जाता रहा है। जिस मंत्री की सुुबह 10 बजे होती है और जो घर से 12 बजे निकलता है, ऐसे मंत्री के खिलाफ नाराजगी स्वाभाविक है। फरियादी चाहे अपने आवेदन लेकर घर के बाहर बैठे रहें, लेकिन मंत्रीजी का जो वक्त है, उससे पहले और बाद किसी के लिए कोई जगह नहीं है। इसीलिए उनके प्रति न केवल भाजपाइयों बल्कि दुर्ग के लोगों की भी नाराजगी बढ़ती गई और इसी का नतीजा है कि पिछले विधानसभा चुनाव में वे महज 700 वोटों के अंतर से ही जीत पाए। उनके कई समर्थक पिछले विधानसभा चुनाव में नाराज होकर इसलिए घर बैठ गए थे कि मंत्री ने हमारे लिए क्या किया?
इन तमाम नेताओं के विपरीत सरोज पाण्डेय ने सबसे पहले अपने समर्थकों की संख्या में इजाफा किया। भुखे भजन न होय गोपाला की तर्ज पर उन्होंने अपने संघर्ष के दिनों के साथियों को किसी न किसी पद पर स्थापित कराया। संगठन के साथ ही किसी न किसी लाभ के पद पर बैठाया। सरोज खुद प्रदेश महामंत्री और प्रवक्ता के पद पर रहीं और अब सांसद हैं, लेकिन उनके समर्थक उनके साथ बराबर बने हुए हैं। वैशाली नगर विधानसभा के उपचुनाव के दौरान जब संगठन ने उनका साथ छोड़ दिया और भिलाई के नेताओं ने उनके लिए काम करने से मना कर दिया तो दुर्ग के उनके समर्थकों ने मोर्चा संभाला। यह दीगर बात है कि आज भिलाई में उनके समर्थकों की संख्या दुर्ग से कहीं कम नहीं है। सरोज पाण्डेय होने के मायने यह भी है कि जिस दुर्ग नगर निगम को उन्होंने विकास कार्यों और सौंदर्य के लिहाज से प्रदेश में सर्वोच्च मुकाम पर पहुंचाया, आज उनकी गैरमौजूदगी में वह निगम कर्मचारियों की तनख्वाह को तरस रहा है और विकास कार्य को खैर ठप्प पड़े ही हैं। इन्हीं सरोज पाण्डेय की एक आवाज पर नगर निगम के कर्मचारी थर्राने लगने थे, लेकिन आज यही कर्मचारी स्वेच्छाचारी हो गए हैं और नगर निगम का काम एक बार फिर से पुराने ढर्रे पर आ गया है।
भिलाई जैसे छोटे से क्षेत्र से राजनीति की शुरूआत करने वाली सरोज पाण्डेय आज दुर्ग संसदीय क्षेत्र की सांसद हैं और भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सचिव बनाई गई हैं। भारतीय जनता पार्टी ने जब उन्हें भिलाई से दुर्ग लाकर महापौर का टिकट दिया था, तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह सरोज इतने लम्बे समय तक खिला भी रह सकता है और न सिर्फ खिला रह सकता है बल्कि और लोगों को भी पल्लवित-पुष्पित करने में सहायक होगा। आज सांसद सरोज की पहचान एक मुखर वक्ता और बेहतरीन नेतृत्वकत्र्ता की है और शायद यही वजह है कि वे छत्तीसगढ़ की कद्दावर नेताओं में गिनीं जानें लगी हैं।
महापौर के अपने दस वर्षों के दो कार्यकाल में दुर्ग शहर का चेहरा बदलने वाली सरोज इस दौरान वैशाली नगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक और दुर्ग लोकसभा से सांसद भी निर्वाचित हुईं। ऐसे बिरले ही लोग होते हैं, जिन्हें इतने कम समय में ऐसी उपलब्धियां हासिल हों। जिस सरोज को महापौर का टिकट दिए जाने पर दुर्ग में विरोध के पुरजोर स्वर उभरे, आज उस दुर्ग में उनके समर्थकों की संख्या इस बात की गवाह है कि सरोज पाण्डेय होने के क्या मायने हैं।
बात सिर्फ सरोज पाण्डेय की उपलब्धियों और समर्थकों की संख्या तक ही नहीं है। इन दस वर्षों में जितने लोगों ने उन्हें समर्थन दिया, आज वे सत्ता या संगठन के अहम् पदों पर हैं। भाजपा या कांग्रेस में इस तरह की क्रांति पहले कभी नहीं आई। प्रत्येक उस नेता ने जिसका कद बढ़ गया, अपने समर्थकों को सिर्फ समर्थक तक ही सीमित रखा। उन्हें आगे बढ़ाने में कभी सहयोग नहीं किया। मोतीलाल वोरा और चंदूलाल चंद्राकर से लेकर दुर्ग जिले की राजनीति के अग्रज रहे चौबे बंधुओं के उदाहरण कांग्रेस में मौजूद हैं तो भाजपा में पूर्व सांसद ताराचंद साहू से लेकर वर्तमान में केबिनेट मंत्री हेमचंद यादव तक के नाम हैं। कांग्रेस के बनिस्बत् भाजपा का राजनीतिक सफर छोटा जरूर रहा है लेकिन दोनों ही पार्टियों में हालात् एक जैसे रहे। मोतीलाल वोरा के लिए तन, मन और धन लगाने वाले लोग लम्बे समय तक हाशिए पर रहे। वोरा की विरासत जब उनके पुत्र अरूण वोरा ने संभाली तो इन समर्थकों के समझ में आया कि अपनी जिंदगी वोरा परिवार को समर्पित करने के बाद उनके हाथ अब यह आया है कि वे पिता के बाद पुत्र की सेवा करें। नतीजतन वोरा के समर्थकों की संख्या बेहद तेजी से गिरी और वोरा की विरासत संभालने वाले उनके पुत्र अरूण वोरा तीन बार विधानसभा का चुनाव हार गए। तब जाकर मोतीलाल वोरा को समझ आया कि गड़बड़ कहां हो रही है। अब वे अपनी पुरानी गलतियों को सुधारने में लगे हैं। अपने एक करीबी समर्थक भजनसिंह निरंकारी को उन्होंने वैशाली नगर विधानसभा का टिकट दिलवाया तो एक अन्य समर्थक शंकरलाल ताम्रकार को दुर्ग से महापौर का टिकट दिलवाया। यह तो रही कांग्रेस की बात। लेकिन भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही। उसके 5 बार के सांसद ताराचंद साहू हमेशा अपने बंगले में कैद रहे और जातीयवादी राजनीति को बढ़ावा देते रहे। उनका कोई समर्थक खास मुकाम हासिल नहीं कर पाया। यहां तक कि साहू ने कभी अपने लोगों को संगठन में भी महत्व दिलवाना मुनासिब नहीं समझा।
तत्कालीन विधानसभा के अध्यक्ष और भिलाई के विधायक प्रेमप्रकाश पाण्डेय ने उनके खिलाफ मोर्चा खोला तब जाकर उन्हें भी अहसास हुआ कि सांसद होने के बावजूद वे किस जगह पर खड़े हैं। और इसी के बाद पहले अघोषित और फिर घोषित तौर पर युद्ध प्रारम्भ हो गया। इस युद्ध का नतीजा ताराचंद साहू को पार्टी से निष्कासन के रूप में भोगना पड़ा और अब वे छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच नाम के एक संगठन के बैनर तले अपने समर्थकों को एकजुट करने में लगे हैं। यह हालात कमोबेश वैसे ही हैं, जैसे मोतीलाल वोरा के साथ रहे। पद पर रहते और सत्तासुख भोगते इन्हें कभी अपने समर्थकों की याद नहीं आई। उन्होंने अपने तमाम समर्थकों के बावजूद अपने एक नौसिखिए पुत्र को साजा विधानसभा से टिकट दिलवाई तो पार्टी से बगावत कर अपनी पुत्री झमिता साहू को जिला पंचायत का अध्यक्ष बनवाया। उन्होंने जो कुछ किया, अपने और अपने परिवार के लिए।
दुर्ग से तीन बार विधायक और दो बार के केबिनेटमंत्री हेमचंद यादव भी मोतीलाल वोरा और ताराचंद साहू की राह पर हैं। सुख और आराम के तलबगार इस मंत्री को लेकर तरह-तरह की बातें होती है, बावजूद इसके अज्ञात कारणों से उन्हें साफ-सुथरी छवि का लबादा ओढ़ाया जाता रहा है। जिस मंत्री की सुुबह 10 बजे होती है और जो घर से 12 बजे निकलता है, ऐसे मंत्री के खिलाफ नाराजगी स्वाभाविक है। फरियादी चाहे अपने आवेदन लेकर घर के बाहर बैठे रहें, लेकिन मंत्रीजी का जो वक्त है, उससे पहले और बाद किसी के लिए कोई जगह नहीं है। इसीलिए उनके प्रति न केवल भाजपाइयों बल्कि दुर्ग के लोगों की भी नाराजगी बढ़ती गई और इसी का नतीजा है कि पिछले विधानसभा चुनाव में वे महज 700 वोटों के अंतर से ही जीत पाए। उनके कई समर्थक पिछले विधानसभा चुनाव में नाराज होकर इसलिए घर बैठ गए थे कि मंत्री ने हमारे लिए क्या किया?
इन तमाम नेताओं के विपरीत सरोज पाण्डेय ने सबसे पहले अपने समर्थकों की संख्या में इजाफा किया। भुखे भजन न होय गोपाला की तर्ज पर उन्होंने अपने संघर्ष के दिनों के साथियों को किसी न किसी पद पर स्थापित कराया। संगठन के साथ ही किसी न किसी लाभ के पद पर बैठाया। सरोज खुद प्रदेश महामंत्री और प्रवक्ता के पद पर रहीं और अब सांसद हैं, लेकिन उनके समर्थक उनके साथ बराबर बने हुए हैं। वैशाली नगर विधानसभा के उपचुनाव के दौरान जब संगठन ने उनका साथ छोड़ दिया और भिलाई के नेताओं ने उनके लिए काम करने से मना कर दिया तो दुर्ग के उनके समर्थकों ने मोर्चा संभाला। यह दीगर बात है कि आज भिलाई में उनके समर्थकों की संख्या दुर्ग से कहीं कम नहीं है। सरोज पाण्डेय होने के मायने यह भी है कि जिस दुर्ग नगर निगम को उन्होंने विकास कार्यों और सौंदर्य के लिहाज से प्रदेश में सर्वोच्च मुकाम पर पहुंचाया, आज उनकी गैरमौजूदगी में वह निगम कर्मचारियों की तनख्वाह को तरस रहा है और विकास कार्य को खैर ठप्प पड़े ही हैं। इन्हीं सरोज पाण्डेय की एक आवाज पर नगर निगम के कर्मचारी थर्राने लगने थे, लेकिन आज यही कर्मचारी स्वेच्छाचारी हो गए हैं और नगर निगम का काम एक बार फिर से पुराने ढर्रे पर आ गया है।
शुक्रवार, 26 मार्च 2010
क्या महंत होंगे केन्द्रीय मंत्री?
रायपुर। केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल और छत्तीसगढ़ को लम्बे समय बाद प्रतिनिधित्व मिलने की खबरों से राज्य के आला नेताओं के कान खड़े हो गए हैं। पिछले दिनों हमने अपने इसी ब्लाग में कहा था कि यहां से खाली हो रही मोहसिना किदवई की राज्यसभा सीट पर कई लोगों की निगाहें लगी हुई है। छत्तीसगढ को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व मिलने के संकेत के साथ ही राज्यसभा की उम्मीद पालने वालों की संख्या और बढऩे की संभावना है। फिलहाल इस राज्यसभा सीट पर वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल की निगाहें लगी हुई हैं। उनके अलावा लोकसभा सांसद चरणदास महंत, पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी, पूर्व मंत्री अरविंद नेताम भी प्रमुख दावेदारों में शुमार हैं। इन नेताओं के समर्थकों को लगता है कि यदि यह सीट हाथ गई तो केन्द्रीय मंत्री का पद ज्यादा दूर नहीं होगा।
छत्तीसगढ़ से खाली हो रही राज्यसभा सीट के लिए दावेदार कौन होगा, यह तो फिलहाल स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा की पसंद को जरूर तवज्जो मिलेगी। लम्बे समय से कांग्रेस का कोष संभालने वाले वोरा समन्वय की राजनीति पर यकीन करते हैं और इसीलिए किसी ऐसे नेता के चुने जाने की संभावना कम ही है जो गुटबाजी को प्रश्रय देता है। इसके अलावा पार्टी के प्रति निष्ठा भी प्रमुख पैमाना होगा, ऐसा जिम्मेदार नेताओ का मानना है। इधर, आदिवासी वर्ग को प्रतिनिधित्व दिए जाने की भी मांग उठने लगी है। आदिवासियों के प्रमुख गढ़ बस्तर से कांग्रेस फिलहाल पूरी तरह साफ है और यदि इस वर्ग को महत्व मिलता है तो भविष्य में पार्टी को फायदा होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन दिक्कत यह है कि कांग्रेस के पास प्रभावशाली आदिवासी नेतृत्व का अभाव है। विधानसभा में पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा और पूर्व मंत्री अरविंद नेताम का नाम उभरकर जरूर आता है, पर कर्मा विधानसभा चुनाव में हार के बाद से घर में बैठे हुए हैं। सलवा जुड़ूम अभियान चलाने और नक्सलियों के खिलाफ मोर्चा खोले जाने को लेकर वे किसी समय खूब चर्चा में रहे, किन्तु अब उनकी गतिविधियां भी ठप्प पड़ी हुई हैं। किसी समय विश्वव्यापी सुर्खियां बटोरने वाला सलवा जुडूम अभियान अब बंद हो चुका है। नक्सलियों से बैर मोल लेने की वजह से कर्मा परिवार को कई बलिदान देने पड़े। अब भी महेन्द्र कर्मा नक्सलियों की हिटलिस्ट में हैं। दूसरी ओर अरविंद नेताम तो कई बरसों से सक्रिय नहीं हैं। विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी पुत्री प्रीति नेताम को टिकट दिलवाई थी, किन्तु वे उसे जितवाकर नहीं ला पाए।
पृथक राज्य बनने के बाद से ही कांग्रेस के सत्ता और संगठन में गुटबाजी हावी रही है। जोगी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद उन्होंने बाकी गुटों को जमकर पानी पिलाया। नतीजतन तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को उनके समक्ष समर्पण करना पड़ा जबकि उन्हें वोरा का खास समर्थक माना जाता था। विद्याचरण शुक्ल छिटककर दूसरे दल में चले गए तो खुद वोरा ने राज्य की राजनीति से तौबा कर ली और चुप हो गए। यह हालात लगातार कायम रहे जब तक विधानसभा के चुनाव में पार्टी को पराजय नहीं मिली। भाजपा के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस के बाकी सभी गुट एकजुट हो गए और जोगी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यही स्थिति आज भी बरकरार है। हालांकि अब जोगी दम्पत्ति विधायक हैं और अपने पुत्र अमित जोगी को युवक कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनवाने प्रयासरत् हैं। लेकिन उन्हें अन्य वरिष्ठ नेताओं का समर्थन नहीं मिल पा रहा है। इसलिए इस बात की संभावना कम ही है कि जोगी राज्यसभा तक पहुंच पाएंगे।
मिल रही खबरों के मुताबिक, केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल का खाका खींचा जा रहा है। संभावना है कि जून-जुलाई में यह काम कर लिया जाएगा। फिलहाल केन्द्रीय मंत्रिमंडल में 78 मंत्री हैं। जबकि अधिकतम 81 मंत्री बनाए जा सकते हैं। छत्तीसगढ़ को छोड़कर लगभग सभी राज्यों को मंत्रिमंडल में स्थान मिला है। पिछले लोकसभा चुनाव में यहां से इकलौते चरणदास महंत ही चुनाव जीते थे। इसलिए महंत स्वाभाविक दावेदार के रूप में भी सामने आ रहे हैं। पार्टीजनों की मानें तो उनके नाम पर किसी को ऐतराज भी नहीं होगा। वे युवा हैं और कांग्रेस में फिलहाल युवाओं को ज्यादा तरजीह दी जा रही है।
००००
छत्तीसगढ़ से खाली हो रही राज्यसभा सीट के लिए दावेदार कौन होगा, यह तो फिलहाल स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा की पसंद को जरूर तवज्जो मिलेगी। लम्बे समय से कांग्रेस का कोष संभालने वाले वोरा समन्वय की राजनीति पर यकीन करते हैं और इसीलिए किसी ऐसे नेता के चुने जाने की संभावना कम ही है जो गुटबाजी को प्रश्रय देता है। इसके अलावा पार्टी के प्रति निष्ठा भी प्रमुख पैमाना होगा, ऐसा जिम्मेदार नेताओ का मानना है। इधर, आदिवासी वर्ग को प्रतिनिधित्व दिए जाने की भी मांग उठने लगी है। आदिवासियों के प्रमुख गढ़ बस्तर से कांग्रेस फिलहाल पूरी तरह साफ है और यदि इस वर्ग को महत्व मिलता है तो भविष्य में पार्टी को फायदा होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन दिक्कत यह है कि कांग्रेस के पास प्रभावशाली आदिवासी नेतृत्व का अभाव है। विधानसभा में पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा और पूर्व मंत्री अरविंद नेताम का नाम उभरकर जरूर आता है, पर कर्मा विधानसभा चुनाव में हार के बाद से घर में बैठे हुए हैं। सलवा जुड़ूम अभियान चलाने और नक्सलियों के खिलाफ मोर्चा खोले जाने को लेकर वे किसी समय खूब चर्चा में रहे, किन्तु अब उनकी गतिविधियां भी ठप्प पड़ी हुई हैं। किसी समय विश्वव्यापी सुर्खियां बटोरने वाला सलवा जुडूम अभियान अब बंद हो चुका है। नक्सलियों से बैर मोल लेने की वजह से कर्मा परिवार को कई बलिदान देने पड़े। अब भी महेन्द्र कर्मा नक्सलियों की हिटलिस्ट में हैं। दूसरी ओर अरविंद नेताम तो कई बरसों से सक्रिय नहीं हैं। विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी पुत्री प्रीति नेताम को टिकट दिलवाई थी, किन्तु वे उसे जितवाकर नहीं ला पाए।
पृथक राज्य बनने के बाद से ही कांग्रेस के सत्ता और संगठन में गुटबाजी हावी रही है। जोगी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद उन्होंने बाकी गुटों को जमकर पानी पिलाया। नतीजतन तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को उनके समक्ष समर्पण करना पड़ा जबकि उन्हें वोरा का खास समर्थक माना जाता था। विद्याचरण शुक्ल छिटककर दूसरे दल में चले गए तो खुद वोरा ने राज्य की राजनीति से तौबा कर ली और चुप हो गए। यह हालात लगातार कायम रहे जब तक विधानसभा के चुनाव में पार्टी को पराजय नहीं मिली। भाजपा के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस के बाकी सभी गुट एकजुट हो गए और जोगी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यही स्थिति आज भी बरकरार है। हालांकि अब जोगी दम्पत्ति विधायक हैं और अपने पुत्र अमित जोगी को युवक कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनवाने प्रयासरत् हैं। लेकिन उन्हें अन्य वरिष्ठ नेताओं का समर्थन नहीं मिल पा रहा है। इसलिए इस बात की संभावना कम ही है कि जोगी राज्यसभा तक पहुंच पाएंगे।
मिल रही खबरों के मुताबिक, केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल का खाका खींचा जा रहा है। संभावना है कि जून-जुलाई में यह काम कर लिया जाएगा। फिलहाल केन्द्रीय मंत्रिमंडल में 78 मंत्री हैं। जबकि अधिकतम 81 मंत्री बनाए जा सकते हैं। छत्तीसगढ़ को छोड़कर लगभग सभी राज्यों को मंत्रिमंडल में स्थान मिला है। पिछले लोकसभा चुनाव में यहां से इकलौते चरणदास महंत ही चुनाव जीते थे। इसलिए महंत स्वाभाविक दावेदार के रूप में भी सामने आ रहे हैं। पार्टीजनों की मानें तो उनके नाम पर किसी को ऐतराज भी नहीं होगा। वे युवा हैं और कांग्रेस में फिलहाल युवाओं को ज्यादा तरजीह दी जा रही है।
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इस थप्पड़ की गूंज दूर तक जाएगी नेताम जी
रायपुर। विधिमंत्री रामविचार नेताम के एक थप्पड़ ने छत्तीसगढ़ में भूचाल ला दिया है। इस थप्पड़ की गूंज अब तक महसूस कर रहे बिलासपुर के एसडीएम संतोष देवांगन ने मंत्री के खिलाफ मोर्चा खोला तो इसके जवाब में नेताम को बचाने आदिवासी विकास परिषद सामने आ गया है। पूरा मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचाने के बाद अब राज्य प्रशासनिक सेवा के कई अफसर मंत्री को निपटाने की कोशिशों में लग गए हैं। इन कोशिशों को आगे बढ़ाने में भी भाजपा का ही एक वर्ग भरपूर सहयोग कर रहा है। एक ओर जहां आविप ने नेताम को बचाने प्रदेशव्यापी मोर्चा खोल दिया है तो दूसरी ओर संसदीय सचिव और विधायक भैय्यालाल रजवाड़े पूरे घटनाक्रम के लिए एसडीएम देवांगन को ही कटघरे में खड़ा किया है।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति केजी बालकृष्णन पिछले शनिवार को एक कार्यक्रम में शिरकत करने बिलासपुर आए थे। इसी कार्यक्रम में भाग लेने राज्य के विधिमंत्री रामविचार नेताम भी पहुंचे। यहां पहुंचने के बाद उन्हें पता चला कि एसईसीएल के गेस्ट हाउस में उनके लिए कमरा आरक्षित नहीं करवाया गया है। मंत्री नेताम ने पूछताछ की तो कोई जवाब देने वाला नहीं मिला। नतीजतन मुख्य न्यायाधिपति के कार्यक्रम में ड्यूटी बजा रहे बिलासपुर के एसडीएम संतोष देवांगन को गेस्ट हाउस बुलाया गया जहां मंत्री ने बातचीत के दौरान कथित तौर पर देवांगन को थप्पड़ मार दिया। एसडीएम देवांगन ने दूसरे दिन कलेक्टर सोनमणि बोरा को घटना की लिखित जानकारी दी। बाद में उन्होंने राज्य प्रशासनिक सेवा संघ से भी मामले की शिकायत की। संघ ने राजधानी रायपुर में एक आपात बैठक करने के बाद पूरे वाकये से मुख्यमंत्री को अवगत कराया और दोषी मंत्री पर कार्यवाही की मांग की।
खुद के खिलाफ इस तरह मोर्चा खोले जाने की उम्मीद शायद विधिमंत्री को भी नहीं थी। दरअसल, उनकी अपनी पार्टी के कई लोग इस मामले को तूल दे रहे थे। भाजपा के कई वरिष्ठ नेता नेताम की कार्यप्रणाली से नाखुश बताए गए हैं। शायद इसीलिए एक बेहतरीन मौका हाथ लगने के साथ ही उन्होंने आग में घी डालना शुरू कर दिया। मंत्री नेताम को इसकी जानकारी हुई तो आदिवासी विकास परिषद को सामने ले आए। अब परिषद एसडीएम मारपीट प्रकरण को आदिवासी समाज के साथ जोड़कर पुतले फूंकने और राज्यव्यापी माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। उसके नेताओं का आरोप है कि आदिवासी मंत्री को अकारण फंसाया जा रहा है। इधर, भाजपा के ही एक विधायक और संसदीय सचिव भैय्याराल रजवाड़े ने एसडीएम संतोष अग्रवाल पर ही ठिकरा फोड़ दिया है। उनके मुताबिक, ''एक बार देवांगन ने उनसे परिचय मांगते हुए कह दिया था कि किसी के माथे पर नहीं लिखा है कि संसदीय सचिव है।ÓÓ
दूसरी ओर बिलासपुर के राजपत्रित अधिकारी संघ ने मंत्री रामविचार नेताम के कृत्य की आलोचना करते हुए ग्राम सुराज अभियान के बहिष्कार और मंत्री के प्रोटोकाल से पल्ला झाडऩे की चेतावनी दी है। यदि ग्राम सुराज जैसा अभियान असफल होता है तो इससे सरकार की किरकिरी होने से भी इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल इस मामले से उपजा विवाद थमता नहीं दिख रहा है। विरोध और बचाव का क्रम यदि इसी तरह जारी रहा तो संभव है कि मुख्यमंत्री को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़े। प्रशासनिक अफसर जिस तरह से मंत्री के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं, उसके बाद इस बात की भी संभावना बढ़ गई है कि कहीं मंत्री नेताम ही न निपट जाएं। कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि मंत्री के थप्पड़ की गूंज दूर तक जाएगी।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति केजी बालकृष्णन पिछले शनिवार को एक कार्यक्रम में शिरकत करने बिलासपुर आए थे। इसी कार्यक्रम में भाग लेने राज्य के विधिमंत्री रामविचार नेताम भी पहुंचे। यहां पहुंचने के बाद उन्हें पता चला कि एसईसीएल के गेस्ट हाउस में उनके लिए कमरा आरक्षित नहीं करवाया गया है। मंत्री नेताम ने पूछताछ की तो कोई जवाब देने वाला नहीं मिला। नतीजतन मुख्य न्यायाधिपति के कार्यक्रम में ड्यूटी बजा रहे बिलासपुर के एसडीएम संतोष देवांगन को गेस्ट हाउस बुलाया गया जहां मंत्री ने बातचीत के दौरान कथित तौर पर देवांगन को थप्पड़ मार दिया। एसडीएम देवांगन ने दूसरे दिन कलेक्टर सोनमणि बोरा को घटना की लिखित जानकारी दी। बाद में उन्होंने राज्य प्रशासनिक सेवा संघ से भी मामले की शिकायत की। संघ ने राजधानी रायपुर में एक आपात बैठक करने के बाद पूरे वाकये से मुख्यमंत्री को अवगत कराया और दोषी मंत्री पर कार्यवाही की मांग की।
खुद के खिलाफ इस तरह मोर्चा खोले जाने की उम्मीद शायद विधिमंत्री को भी नहीं थी। दरअसल, उनकी अपनी पार्टी के कई लोग इस मामले को तूल दे रहे थे। भाजपा के कई वरिष्ठ नेता नेताम की कार्यप्रणाली से नाखुश बताए गए हैं। शायद इसीलिए एक बेहतरीन मौका हाथ लगने के साथ ही उन्होंने आग में घी डालना शुरू कर दिया। मंत्री नेताम को इसकी जानकारी हुई तो आदिवासी विकास परिषद को सामने ले आए। अब परिषद एसडीएम मारपीट प्रकरण को आदिवासी समाज के साथ जोड़कर पुतले फूंकने और राज्यव्यापी माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। उसके नेताओं का आरोप है कि आदिवासी मंत्री को अकारण फंसाया जा रहा है। इधर, भाजपा के ही एक विधायक और संसदीय सचिव भैय्याराल रजवाड़े ने एसडीएम संतोष अग्रवाल पर ही ठिकरा फोड़ दिया है। उनके मुताबिक, ''एक बार देवांगन ने उनसे परिचय मांगते हुए कह दिया था कि किसी के माथे पर नहीं लिखा है कि संसदीय सचिव है।ÓÓ
दूसरी ओर बिलासपुर के राजपत्रित अधिकारी संघ ने मंत्री रामविचार नेताम के कृत्य की आलोचना करते हुए ग्राम सुराज अभियान के बहिष्कार और मंत्री के प्रोटोकाल से पल्ला झाडऩे की चेतावनी दी है। यदि ग्राम सुराज जैसा अभियान असफल होता है तो इससे सरकार की किरकिरी होने से भी इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल इस मामले से उपजा विवाद थमता नहीं दिख रहा है। विरोध और बचाव का क्रम यदि इसी तरह जारी रहा तो संभव है कि मुख्यमंत्री को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़े। प्रशासनिक अफसर जिस तरह से मंत्री के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं, उसके बाद इस बात की भी संभावना बढ़ गई है कि कहीं मंत्री नेताम ही न निपट जाएं। कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि मंत्री के थप्पड़ की गूंज दूर तक जाएगी।
गुरुवार, 18 मार्च 2010
मोहसिना की सीट पर निगाहें
छत्तीसगढ़ के कई नेताओं की निगाहें जून में कार्यकाल पूरा कर रही मोहसिना किदवई की राज्यसभा सीट पर है। किदवई को हज कमेटी का अध्यक्ष बना दिया गया है, इसलिए अब इस बात की संभावना कम ही है कि उन्हें फिर से राज्यसभा में भेजा जाए। राज्य के कई दिग्गजों की राजनीति जंग खा रही है। ऐसे कांग्रेसियों की मंशा एक बार फिर अपनी राजनीति को चमकाने की है। इसके लिए प्रयास भी तेज कर दिए गए हैं। आलाकमान तक सम्पर्क बनाने और मेल-जोल बढ़ाने का काम भी शुरू हो गया है।
कांग्रेस की महासचिव मोहसिना किदवई का कार्यकाल 29 जून को खत्म हो रहा है। अब तक जो संकेत मिले हैं, उसके मुताबिक, पार्टी आलाकमान ने किदवई को रिपीट नहीं करने का मन बना लिया गया है। इस संकेत के साथ ही राज्य के कई प्रमुख नेता सक्रिय हो गए हैं। लम्बे समय से उपेक्षित रहे पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल को इस राज्यसभा सीट का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। इसके लिए उन्होंने कोशिशें भी तेज कर दी हैं। फिलहाल वे आला नेताओ से संबंध सुधारने से लेकर मेलजोल बढ़ाने का काम कर रहे हैं, ताकि मौका आने पर इसे भुनाया जा सके। शुक्ल के समर्थकों की छत्तीसगढ़ में कमी नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि इतने ही विरोधी भी उन्होंने पाल रखे हैं। इसलिए राज्यसभा जाने की उनकी राह आसान नहीं है। कभी छत्तीसगढ़ की राजनीति में एकछत्र राज करने वाले शुक्ल ने कई बार पार्टियां बदली और फिर कांग्रेस में लौटे। अंतिम बार वे भाजपा में चले गए थे, किन्तु बाद में उनकी कांग्रेस में वापसी हो गई। उनके राजनीतिक विरोधी रहे पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी खुद इस सीट पर नजर गड़ाए हैं। जोगी के कई समर्थको ने इसके लिए लॉबिंग भी शुरू कर दी है। सिर्फ इतना ही नहीं, जोगी को राज्यसभा में लेने और उसके बाद मंत्रिमंडल में शामिल करने की बातें भी की जाने लगी है। फिलहाल जोगी विधानसभा के सदस्य हैं और उनके स्वास्थ्य को देखते हुए राज्यसभा पहुंचने का रास्ता बंद बताया जा रहा है। वैसे भी, जोगी गुट को छोड़कर और कोई नहीं चाहता कि उन्हें फिर से ऐसा कोई पॉवर मिले कि मुश्किलें पैदा हो। मामला क्योंकि छत्तीसगढ़ से जुड़ा है इसलिए राज्यसभा के लिए चेहरे के चयन में मोतीलाल वोरा की भूमिका अहम होगी। वोरा खुद भी राज्यसभा के सदस्य हैं। वोरा बेहद शांतमिजाज व्यक्ति हैं और आमतौर पर अपनी राय जाहिर नहीं करते हैं।
जोगी के समर्थक और पूर्व विधायक अमरजीत भगत समेत अन्य लोग वरिष्ठ नेताओं के समक्ष अपनी भावनाएं रख आए हैं। समर्थकों के मुताबिक, यदि जोगी को राज्यसभा सदस्य बनाकर मंत्री बनाया जाता है तो छत्तीसगढ़ के साथ ही उड़ीसा और झारखंड जैसे आदिवासी राज्यों में पार्टी को खड़ा करने में आसानी होगी। इधर, बस्तर के वरिष्ठ आदिवासी नेता अरविंद नेताम भी राज्यसभा टिकट की जुगाड़ में हैं। हालांकि प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद चरणदास महंत की मंशा है कि नेताम को आदिवासी आयोग का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया जाए। अनुसूचित जाति कोटे से दो पूर्व सांसद परसराम भारद्वाज और कमला मनहर भी राज्यसभा जाने की इच्छा रखते हैं। फिलहाल दोनों हाशिए पर हैं। इन नामों के अलावा कई और लोग भी हैं, जो राज्यसभा जाने की उम्मीद पाले बैठे हैं। वे हाल-फिलहाल दिल्ली के आकाओं तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में लगे हैं।
कांग्रेस की महासचिव मोहसिना किदवई का कार्यकाल 29 जून को खत्म हो रहा है। अब तक जो संकेत मिले हैं, उसके मुताबिक, पार्टी आलाकमान ने किदवई को रिपीट नहीं करने का मन बना लिया गया है। इस संकेत के साथ ही राज्य के कई प्रमुख नेता सक्रिय हो गए हैं। लम्बे समय से उपेक्षित रहे पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल को इस राज्यसभा सीट का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। इसके लिए उन्होंने कोशिशें भी तेज कर दी हैं। फिलहाल वे आला नेताओ से संबंध सुधारने से लेकर मेलजोल बढ़ाने का काम कर रहे हैं, ताकि मौका आने पर इसे भुनाया जा सके। शुक्ल के समर्थकों की छत्तीसगढ़ में कमी नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि इतने ही विरोधी भी उन्होंने पाल रखे हैं। इसलिए राज्यसभा जाने की उनकी राह आसान नहीं है। कभी छत्तीसगढ़ की राजनीति में एकछत्र राज करने वाले शुक्ल ने कई बार पार्टियां बदली और फिर कांग्रेस में लौटे। अंतिम बार वे भाजपा में चले गए थे, किन्तु बाद में उनकी कांग्रेस में वापसी हो गई। उनके राजनीतिक विरोधी रहे पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी खुद इस सीट पर नजर गड़ाए हैं। जोगी के कई समर्थको ने इसके लिए लॉबिंग भी शुरू कर दी है। सिर्फ इतना ही नहीं, जोगी को राज्यसभा में लेने और उसके बाद मंत्रिमंडल में शामिल करने की बातें भी की जाने लगी है। फिलहाल जोगी विधानसभा के सदस्य हैं और उनके स्वास्थ्य को देखते हुए राज्यसभा पहुंचने का रास्ता बंद बताया जा रहा है। वैसे भी, जोगी गुट को छोड़कर और कोई नहीं चाहता कि उन्हें फिर से ऐसा कोई पॉवर मिले कि मुश्किलें पैदा हो। मामला क्योंकि छत्तीसगढ़ से जुड़ा है इसलिए राज्यसभा के लिए चेहरे के चयन में मोतीलाल वोरा की भूमिका अहम होगी। वोरा खुद भी राज्यसभा के सदस्य हैं। वोरा बेहद शांतमिजाज व्यक्ति हैं और आमतौर पर अपनी राय जाहिर नहीं करते हैं।
जोगी के समर्थक और पूर्व विधायक अमरजीत भगत समेत अन्य लोग वरिष्ठ नेताओं के समक्ष अपनी भावनाएं रख आए हैं। समर्थकों के मुताबिक, यदि जोगी को राज्यसभा सदस्य बनाकर मंत्री बनाया जाता है तो छत्तीसगढ़ के साथ ही उड़ीसा और झारखंड जैसे आदिवासी राज्यों में पार्टी को खड़ा करने में आसानी होगी। इधर, बस्तर के वरिष्ठ आदिवासी नेता अरविंद नेताम भी राज्यसभा टिकट की जुगाड़ में हैं। हालांकि प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद चरणदास महंत की मंशा है कि नेताम को आदिवासी आयोग का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया जाए। अनुसूचित जाति कोटे से दो पूर्व सांसद परसराम भारद्वाज और कमला मनहर भी राज्यसभा जाने की इच्छा रखते हैं। फिलहाल दोनों हाशिए पर हैं। इन नामों के अलावा कई और लोग भी हैं, जो राज्यसभा जाने की उम्मीद पाले बैठे हैं। वे हाल-फिलहाल दिल्ली के आकाओं तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में लगे हैं।
टीम में गड़बड़ी है गड़करी जी
भाजपा की बहुप्रतीक्षित टीम गड़करी की घोषणा तो कर दी गई, लेकिन इस टीम को लेकर पार्टी के भीतर ही भीतर असंतोष के स्वर भी सुनाई पडऩे लगे हैं। सबसे ज्यादा नाराजगी छत्तीसगढ़ के आदिवासी वर्ग में है, जिसे कम से कम इस बार तो राष्ट्रीय टीम में शामिल होने की उम्मीद थी। इसके अलावा मुस्लिम तबका भी नाराज़ है।
पिछले करीब 10 वर्षों से छत्तीसगढ़ के आदिवासी समय-बेसमय एकजुट होते रहे हैं और अपनी ताकत का अहसास भी कराते रहे हैं। पिछले दो विधानसभा चुनाव में आदिवासियों के बूते ही भाजपा छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने में कामयाब रही। बावजूद इसके सत्ता से लेकर संगठन तक में उनकी उपेक्षा की जाती रही है। राजनाथ सिंह की पिछली टीम में छत्तीसगढ़ से करूणा शुक्ला उपाध्यक्ष और सरोज पाण्डेय सचिव बनाईं गईं थीं। गड़करी ने इन दोनों को इसी पद पर बरकरार रखा है। दिलीप सिंह जूदेव को कार्यकारिणी में रखा गया है तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और संसदीय दल के सचेतक रमेश बैस को स्थाई आमंत्रित सदस्य बनाया गया है।
हाल ही में राजधानी रायपुर में पूरे छत्तीसगढ़ के आदिवासियों ने रैली कर अपनी ताकत दिखाई थी। इस रैली में भाजपा, कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी समेत अन्य दलों के आदिवासियों ने शिरकत की और मुख्यमंत्री और राज्यपाल जैसे अहम् पदों पर अपनी दावेदारी ठोंकी थी। किन्तु भाजपा संगठन में ही उनकी एक बार फिर उपेक्षा कर दी गई। राज्य में आदिवासी एक्सप्रेस चलने की खबरें प्रमुखता पाती रही हैं। खासतौर पर स्वयं को आदिवासी बताने वाले अजीत जोगी के शासनकाल के दौरान आदिवासी लामबंद हुए। इन आदिवासियों का नेतृत्व तब वरिष्ठ भाजपा नेता नंदकुमार साय ने किया था- जो अपनी कठोर टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। संभवत: यही वह वक्त था, जब 'इंदिरा प्रेमी आदिवासी भाजपा की ओर उन्मुख हुए। लेकिन साय को भी इसका कोई प्रतिसाद नहीं मिल पाया। फिलहाल वे हाशिए पर हैं, पर उनकी तैयार की गई जमीन पर भाजपा अब भी वोटों की खेती कर रही है।
सिर्फ आदिवासी ही नहीं, मुसलमानों में भी टीम गड़करी को लेकर नाराजगी का पुट है। मंदिर-मस्जिद मिलकर बनाने, मुसलमानों के साथ सामंजस्य बनाकर काम करने और पार्टी का प्रचलित चोला बदलने की बात करने वाले गडकरी की टीम में अपनी नजरअंदाजी मुसलमान पचा नहीं पा रहे हैं। हालांकि छत्तीसगढ़ भाजपा में कोई बड़ा मुस्लिम नेतृत्व उभरकर सामने नहीं आया है, फिर भी अपने समाज को लीड करने वाले कई नेता चिंतित हैं। दरअसल, अपना राजनैतिक कद बढ़ाने की लगातार कोशिशें करने वाले भाजपा के मुस्लिम नेताओं को इस बात की चिंता सता रही है कि अपने लोगों के बीच जाकर वे क्या संदेश देंगे? गौरतलब है कि राज्य के अधिकांश मुसलमान आज भी भाजपा से दूर हैं। विकल्प के अभाव में वे कांग्रेस का साथ देते रहे हैं। उन्हें पार्टी के करीब लाने के लिए भाजपा की अल्पसंख्यक इकाइयां लगातार काम कर रही हैं, लेकिन उनकी कामयाबी का प्रतिशत बेहद कम है। सही मायनों में, छत्तीसगढ़ की अल्पसंख्यक बिरादरी भाजपा को अछूत मानती रही है। उसके कई कट्टरपंथी नेताओं की कड़वी जुबान से यही बिरादरी आहत होती है। शायद यही वजह है कि भाजपा के अल्पसंख्यक नेताओं से समाज के लोग कुछ दूरी बनाकर रखते हैं। भले ही पार्टी के नेता इसे स्वीकार नहीं करे और यह दावा करें कि अब अल्पसंख्यक वर्ग भाजपा के साथ हैं, किन्तु हकीकत यही है कि भाजपा अब तक मुसलमानों का विश्वास अर्जित नहीं कर पाई है।
पार्टी के एक जिम्मेदार मुस्लिम नेता के मुताबिक, हर बार यदि प्रचलित चेहरों को ही मौका दिया जाएगा तो बाकी लोग क्या करेंगे? जो लोग पहले से ही महत्वपूर्ण पदों पर हैं या सांसद, मंत्री हैं, उन्हें ही हर बार महत्व मिलता रहेगा तो उन लोगों का क्या- जो पूरी जिम्मेदारी के साथ काम कर रहे हैं और जिन पर पूरे समाज या समुदाय की जिम्मेदारी है? प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष विष्णुदेव साय के मुताबिक, भाजपा की राष्ट्रीय टीम में प्रदेश के चार पदाधिकारियों दिलीप सिंह जूदेव, करूणा शुक्ला, सरोज पान्डेय व सौदान सिंह सहित सात सदस्यों को दिए प्रतिनिधित्व दिया गया है। इस नई टीम से प्रदेश को नई दिशा मिलेगी।
दुर्ग जिले की सांसद सरोज पाण्डेय की नेतृत्व क्षमता पर शायद ही किसी को संदेह हो। महज कुछ वर्षों में एक सामान्य कार्यकर्ता से ऊपर उठकर वे दो बार महापौर, 1 बार विधायक और अब सांसद निर्वाचित हुई। कुछ समय में ही उन्होंने प्रदेश भाजपा की प्रवक्ता और राष्ट्रीय मंत्री तक का सफर तय किया। ऐसे नेतृत्व को सामने लाने का पार्टी में जोरदार स्वागत किया जाना चाहिए और सही मायनों में ऐसे युवाओं पर ही भाजपा की भावी कमान होगी। लेकिन पार्टी को और ज्यादा निखारने और छूट रहे बड़े वर्ग को प्रतिनिधित्व देना भी पार्टी की ही जिम्मेदारी है। बेहद स्वादिष्ट भोजन में एक कंकड़ ही पूरा स्वाद खराब कर देता है। भाजपा के जायके में ऐसा कोई कंकड़ न आए, इसका गड़करी को ध्यान रखना होगा।
पिछले करीब 10 वर्षों से छत्तीसगढ़ के आदिवासी समय-बेसमय एकजुट होते रहे हैं और अपनी ताकत का अहसास भी कराते रहे हैं। पिछले दो विधानसभा चुनाव में आदिवासियों के बूते ही भाजपा छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने में कामयाब रही। बावजूद इसके सत्ता से लेकर संगठन तक में उनकी उपेक्षा की जाती रही है। राजनाथ सिंह की पिछली टीम में छत्तीसगढ़ से करूणा शुक्ला उपाध्यक्ष और सरोज पाण्डेय सचिव बनाईं गईं थीं। गड़करी ने इन दोनों को इसी पद पर बरकरार रखा है। दिलीप सिंह जूदेव को कार्यकारिणी में रखा गया है तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और संसदीय दल के सचेतक रमेश बैस को स्थाई आमंत्रित सदस्य बनाया गया है।
हाल ही में राजधानी रायपुर में पूरे छत्तीसगढ़ के आदिवासियों ने रैली कर अपनी ताकत दिखाई थी। इस रैली में भाजपा, कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी समेत अन्य दलों के आदिवासियों ने शिरकत की और मुख्यमंत्री और राज्यपाल जैसे अहम् पदों पर अपनी दावेदारी ठोंकी थी। किन्तु भाजपा संगठन में ही उनकी एक बार फिर उपेक्षा कर दी गई। राज्य में आदिवासी एक्सप्रेस चलने की खबरें प्रमुखता पाती रही हैं। खासतौर पर स्वयं को आदिवासी बताने वाले अजीत जोगी के शासनकाल के दौरान आदिवासी लामबंद हुए। इन आदिवासियों का नेतृत्व तब वरिष्ठ भाजपा नेता नंदकुमार साय ने किया था- जो अपनी कठोर टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। संभवत: यही वह वक्त था, जब 'इंदिरा प्रेमी आदिवासी भाजपा की ओर उन्मुख हुए। लेकिन साय को भी इसका कोई प्रतिसाद नहीं मिल पाया। फिलहाल वे हाशिए पर हैं, पर उनकी तैयार की गई जमीन पर भाजपा अब भी वोटों की खेती कर रही है।
सिर्फ आदिवासी ही नहीं, मुसलमानों में भी टीम गड़करी को लेकर नाराजगी का पुट है। मंदिर-मस्जिद मिलकर बनाने, मुसलमानों के साथ सामंजस्य बनाकर काम करने और पार्टी का प्रचलित चोला बदलने की बात करने वाले गडकरी की टीम में अपनी नजरअंदाजी मुसलमान पचा नहीं पा रहे हैं। हालांकि छत्तीसगढ़ भाजपा में कोई बड़ा मुस्लिम नेतृत्व उभरकर सामने नहीं आया है, फिर भी अपने समाज को लीड करने वाले कई नेता चिंतित हैं। दरअसल, अपना राजनैतिक कद बढ़ाने की लगातार कोशिशें करने वाले भाजपा के मुस्लिम नेताओं को इस बात की चिंता सता रही है कि अपने लोगों के बीच जाकर वे क्या संदेश देंगे? गौरतलब है कि राज्य के अधिकांश मुसलमान आज भी भाजपा से दूर हैं। विकल्प के अभाव में वे कांग्रेस का साथ देते रहे हैं। उन्हें पार्टी के करीब लाने के लिए भाजपा की अल्पसंख्यक इकाइयां लगातार काम कर रही हैं, लेकिन उनकी कामयाबी का प्रतिशत बेहद कम है। सही मायनों में, छत्तीसगढ़ की अल्पसंख्यक बिरादरी भाजपा को अछूत मानती रही है। उसके कई कट्टरपंथी नेताओं की कड़वी जुबान से यही बिरादरी आहत होती है। शायद यही वजह है कि भाजपा के अल्पसंख्यक नेताओं से समाज के लोग कुछ दूरी बनाकर रखते हैं। भले ही पार्टी के नेता इसे स्वीकार नहीं करे और यह दावा करें कि अब अल्पसंख्यक वर्ग भाजपा के साथ हैं, किन्तु हकीकत यही है कि भाजपा अब तक मुसलमानों का विश्वास अर्जित नहीं कर पाई है।
पार्टी के एक जिम्मेदार मुस्लिम नेता के मुताबिक, हर बार यदि प्रचलित चेहरों को ही मौका दिया जाएगा तो बाकी लोग क्या करेंगे? जो लोग पहले से ही महत्वपूर्ण पदों पर हैं या सांसद, मंत्री हैं, उन्हें ही हर बार महत्व मिलता रहेगा तो उन लोगों का क्या- जो पूरी जिम्मेदारी के साथ काम कर रहे हैं और जिन पर पूरे समाज या समुदाय की जिम्मेदारी है? प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष विष्णुदेव साय के मुताबिक, भाजपा की राष्ट्रीय टीम में प्रदेश के चार पदाधिकारियों दिलीप सिंह जूदेव, करूणा शुक्ला, सरोज पान्डेय व सौदान सिंह सहित सात सदस्यों को दिए प्रतिनिधित्व दिया गया है। इस नई टीम से प्रदेश को नई दिशा मिलेगी।
दुर्ग जिले की सांसद सरोज पाण्डेय की नेतृत्व क्षमता पर शायद ही किसी को संदेह हो। महज कुछ वर्षों में एक सामान्य कार्यकर्ता से ऊपर उठकर वे दो बार महापौर, 1 बार विधायक और अब सांसद निर्वाचित हुई। कुछ समय में ही उन्होंने प्रदेश भाजपा की प्रवक्ता और राष्ट्रीय मंत्री तक का सफर तय किया। ऐसे नेतृत्व को सामने लाने का पार्टी में जोरदार स्वागत किया जाना चाहिए और सही मायनों में ऐसे युवाओं पर ही भाजपा की भावी कमान होगी। लेकिन पार्टी को और ज्यादा निखारने और छूट रहे बड़े वर्ग को प्रतिनिधित्व देना भी पार्टी की ही जिम्मेदारी है। बेहद स्वादिष्ट भोजन में एक कंकड़ ही पूरा स्वाद खराब कर देता है। भाजपा के जायके में ऐसा कोई कंकड़ न आए, इसका गड़करी को ध्यान रखना होगा।
गुरुवार, 11 मार्च 2010
महिला क्यो नहीं हो सकती नेता प्रतिपक्ष
दुर्ग। नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर शहर कांग्रेस पूरी तरह ठंडी पडी हुई है। पिछले दिनों कांग्रेस का नेता चुनने के लिए बुलाई गई बैठक का विषय बदलकर पार्टी ने यह जाहिर कर दिया है कि वह कुछ करने की स्थिति में नहीं है। पार्षदों को यह समझ नहीं आ रहा है कि आखिर उन्हें अलग-थलग क्यों रखा गया है और नेता प्रतिपक्ष का चयन क्यों नहीं किया जा रहा है?
नगर निगम चुनाव के नतीजे आए 2 महीने से ज्यादा वक्त बीत चुका है और इस दौरान भाजपा का जहां महापौर बना, वहीं नगर निगम में भाजपा पार्षदों का बहुमत भी आया। भाजपा ने महापौर परिषद का गठन भी कर लिया और परिषद के सभी विभाग अपने-अपने काम में लग गए हैं। किन्तु इन कामों की मानिटरिंग करने के लिए कांग्रेस अब तक नेता प्रतिपक्ष नहीं बना पाई है। शहर में पानी का गम्भीर संकट है। जगह-जगह गंदगी और कचरे का जमाव है, लोगों के नगर निगम से संबधित छोटे-छोटे काम भी नहीं हो पा रहे हैं। बावजूद इसके शहर कांग्रेस के नेता हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। शहर कांग्रेस के अध्यक्ष अरूण वोरा लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव हार चुके हैं और इसीलिए उन्हें हर कोई गद्दार नजर आता है। पार्टी के लोगों का मानना है कि वोरा, किसी को आगे बढ़ते नहीं देखना चाहते। वर्तमान में पूर्व महापौर रघुनाथ वर्मा के अलावा धाकड़ माने जाने वाले पार्षद देवकुमार जंघेल, अलताफ अहमद और सजय कोहले नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में हैं। जबकि महिलाओं में रागिनीदेवी सोनी, सोनम नारायणी और कन्या ढीमर के नाम सामने आ रहे हैं।
एक ओर जहां कांग्रेस महिला आरक्षण विधेयक पारित हो जाने को अपनी उपलब्धि बता रही है तो दूसरी ओर उसे महिलाओं को सामने लाने से गुरेज है। सवाल है कि आखिर नेता प्रतिपक्ष के पद पर कोई महिला क्यों नहीं बैठ सकती? कांग्रेस के जानकार सूत्रों की मानें तो शहर कांग्रेस पर कब्जा जमाए रखने के लिए अरूण वोरा नित नए खेल खेल रहे हैं। संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया जारी है और इस हेतु पर्यवेक्षक भी भेजे गए हैं। बावजूद इसके अरूण वोरा ने अपने स्थानीय समर्थकों को पर्यवेक्षक बना दिया है। जबकि संगठनात्मक चुनाव उन्हीं पर्यवेक्षकों द्वारा सम्पन्न कराए जाने हैं, जिसको शीर्ष स्तर से भेजा गया है। कांग्रेसियों का आरोप है कि अरूण वोरा अपने पिता की वजह से लगातार मनमानी कर रहे हैं। उनकी मनमानियों का ही नतीजा है कि पार्टी लगातार हाशिए पर जा रही है।
एक कांग्रेस पार्षद के मुताबिक, जब सभी पार्षदों ने मिलजुलकर अरूण वोरा को नेता प्रतिपक्ष चुनने के लिए अधिकृत कर दिया है तो फिर वे पार्षदों से अलग-अलग बात करने जैसी बातें कहकर नौटंकी क्यों कर रहे हैं? इस पार्षद के मुताबिक, सबको मालूम है कि जो भी निर्णय लेना है, वोरा को ही लेना है। बावजूद इसके वे राजनीति के खेल दिखा रहे हैं। शहर कांग्रेस के एक नेता के मुताबिक, अरूण वोरा अब तक खुद कुछ नहीं कर पाए। युवक कांग्रेस का अध्यक्ष रहते उन्होंने कुछ नहीं किया। विधायक बने तब भी कुछ नहीं कर पाए। लगातार चुनाव हारे फिर भी युवा आयोग के अध्यक्ष बना दिए गए। लालबत्ती मिली तब भी वे अपना दायरा नहीं बढ़ा पाए और अब शहर कांग्रेस के अध्यक्ष बन बैठे हैं और निर्वाचित पार्षदों से लेकर संगठन से जुड़े लोगों को निराश कर रहे हैं।
नगर निगम चुनाव के नतीजे आए 2 महीने से ज्यादा वक्त बीत चुका है और इस दौरान भाजपा का जहां महापौर बना, वहीं नगर निगम में भाजपा पार्षदों का बहुमत भी आया। भाजपा ने महापौर परिषद का गठन भी कर लिया और परिषद के सभी विभाग अपने-अपने काम में लग गए हैं। किन्तु इन कामों की मानिटरिंग करने के लिए कांग्रेस अब तक नेता प्रतिपक्ष नहीं बना पाई है। शहर में पानी का गम्भीर संकट है। जगह-जगह गंदगी और कचरे का जमाव है, लोगों के नगर निगम से संबधित छोटे-छोटे काम भी नहीं हो पा रहे हैं। बावजूद इसके शहर कांग्रेस के नेता हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। शहर कांग्रेस के अध्यक्ष अरूण वोरा लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव हार चुके हैं और इसीलिए उन्हें हर कोई गद्दार नजर आता है। पार्टी के लोगों का मानना है कि वोरा, किसी को आगे बढ़ते नहीं देखना चाहते। वर्तमान में पूर्व महापौर रघुनाथ वर्मा के अलावा धाकड़ माने जाने वाले पार्षद देवकुमार जंघेल, अलताफ अहमद और सजय कोहले नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में हैं। जबकि महिलाओं में रागिनीदेवी सोनी, सोनम नारायणी और कन्या ढीमर के नाम सामने आ रहे हैं।
एक ओर जहां कांग्रेस महिला आरक्षण विधेयक पारित हो जाने को अपनी उपलब्धि बता रही है तो दूसरी ओर उसे महिलाओं को सामने लाने से गुरेज है। सवाल है कि आखिर नेता प्रतिपक्ष के पद पर कोई महिला क्यों नहीं बैठ सकती? कांग्रेस के जानकार सूत्रों की मानें तो शहर कांग्रेस पर कब्जा जमाए रखने के लिए अरूण वोरा नित नए खेल खेल रहे हैं। संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया जारी है और इस हेतु पर्यवेक्षक भी भेजे गए हैं। बावजूद इसके अरूण वोरा ने अपने स्थानीय समर्थकों को पर्यवेक्षक बना दिया है। जबकि संगठनात्मक चुनाव उन्हीं पर्यवेक्षकों द्वारा सम्पन्न कराए जाने हैं, जिसको शीर्ष स्तर से भेजा गया है। कांग्रेसियों का आरोप है कि अरूण वोरा अपने पिता की वजह से लगातार मनमानी कर रहे हैं। उनकी मनमानियों का ही नतीजा है कि पार्टी लगातार हाशिए पर जा रही है।
एक कांग्रेस पार्षद के मुताबिक, जब सभी पार्षदों ने मिलजुलकर अरूण वोरा को नेता प्रतिपक्ष चुनने के लिए अधिकृत कर दिया है तो फिर वे पार्षदों से अलग-अलग बात करने जैसी बातें कहकर नौटंकी क्यों कर रहे हैं? इस पार्षद के मुताबिक, सबको मालूम है कि जो भी निर्णय लेना है, वोरा को ही लेना है। बावजूद इसके वे राजनीति के खेल दिखा रहे हैं। शहर कांग्रेस के एक नेता के मुताबिक, अरूण वोरा अब तक खुद कुछ नहीं कर पाए। युवक कांग्रेस का अध्यक्ष रहते उन्होंने कुछ नहीं किया। विधायक बने तब भी कुछ नहीं कर पाए। लगातार चुनाव हारे फिर भी युवा आयोग के अध्यक्ष बना दिए गए। लालबत्ती मिली तब भी वे अपना दायरा नहीं बढ़ा पाए और अब शहर कांग्रेस के अध्यक्ष बन बैठे हैं और निर्वाचित पार्षदों से लेकर संगठन से जुड़े लोगों को निराश कर रहे हैं।
पर्यटन विभाग भी कमाई के मूड़ में
रायपुर। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर छत्तीसगढ़ में भले ही पर्यटन विभाग कुछ कर नहीं पा रहा हो और इस मद के अरबों रूपए भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहे हों, किन्तु लगता है अब यह विभाग भी कमाई के मूड़ में आ गया है। उसने अपने होटलों, मोटल और रेस्ट हाउस को निजी हाथों में सौंपने का मन बना लिया है। सब कुछ ठीक रहा तो इस महीने के अंत तक पर्यटन मंडल के 33 होटल, मोटल व रेस्ट हाउस ठेके की भेंट चढ़ जाएंगे।
नैसर्गिक सौदर्य के लिहाज से छत्तीसगढ़ अद्वितीय है, लेकिन राज्य का पर्यटन विभाग इस सौंदर्य का देश और दुनिया को रसपान कराने में सफल नहीं हो पा रहा है। बस्तर से लेकर सरगुजा तक पूरे राज्य में प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा पड़ा है, लेकिन सरकार के पास इसके लिए कोई योजना नहीं है। राज्य के अभ्यारण्य लावारिसों की तरह हैं, यहां जंगली जानवर लगातार कम हो रहे हैं। वन्य पर्यटन के लिए कोई विशेष योजना नहीं है। वन्य पशुओं का अवैध रूप से हो रहा शिकार तो सरकार रोक नहीं पा रही है, बल्कि जंगलों के सफाए की ओर भी उसका ध्यान नहीं है। खनिज सम्पदा का दोहन और जंगलों का सफाया हो रहा है, जिसके भयावह नतीजे भी सामने आ रहे हैं। हथियों का कहर बरपाना, वन्य जीवों का गांवों और शहरों की ओर पलायन जैसे कारणों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। नतीजतन छत्तीसगढ़ का पूरा पर्यटन चौपट होने की कगार पर है। लेकिन बजाए इस ओर ध्यान देने के, सरकार और पर्यटन मंडल रूपए कमाने के तरीके निकाल रहा है। यह साबित करने की कुचेष्टा की जा रही है कि राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में बनाए गए होटल, और मोटल सरकार के लिए सफेद हाथी साबित हो रहे है। यही वजह है कि होटल-मोटल व रेस्टहाउसों को ठेके पर देने की तैयारी की जा रही है। करोड़ों रुपए खर्च कर बनाए गए सरकारी होटल, मोटल और रेस्ट हाउस अब निजी हाथों में जा रहे है। इसके लिए बाकायदा योजना बना ली गई है। जिसकी पहली प्रक्रिया 12 मार्च को शुरू होगी और 27 मार्च तक पर्यटन मंडल की 33 होटल, मोटल व रेस्ट हाउस को ठेके पर सौंप दिया जाएगा।
छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल ने मैनेजमेंट कांट्रेक्ट बेस में पहले चरण पर प्री-बिड कांफ्रेंस 15 मार्च को दोपहर तीन बजे मुख्यालय में आयोजित की गई है। इच्छुक लोगों को फार्म भी जारी कर दिया गया है। फार्म 12 मार्च को शाम पांच बजे तक जमा करने की ताकीद भी की गई है। दूसरे चरण यानी की फाइनेंशियल बिड 27 मार्च को शाम पांच बजे खोली जाएगी। यह सारी प्रक्रिया दुरस्तगी से की गई है पर फार्म की उपलब्धता सीमित हाथों में ही है।
नवनिर्मित और आशीशान होटल मोटल के कुल 12 समूह तैयार किए गए हैं। जिसमें कुल मिलाकर 33 स्थानों की होटल, रेस्ट हाउस व मोटल हैं। इसमें रायपुर ग्रुप की टूरिस्ट मोटल केंद्री, टूरिस्ट मोटल भाटागांव रेस्ट हाउस भाठागांव, कांकेर ग्रुप की नथिया नवागांव मोटल, टूरिस्ट मोटल कांकेर, टूरिस्ट मोटल कोंडागांव जगदलपुर की टूरिस्ट मोटल आसाना, टूरिस्ट मोटल तीरथगढ़, टूरिस्ट मोटल हाराम दंतेवाड़ा, मोटल खपरी दुर्ग, मोटल तुमड़ीबोड़ राजनांदगांव, तांदुला रेस्ट हाउस दुर्ग, कवर्धा मोटल, भोरमदेव रेस्ट हाउस कबीरधाम, मोटल कांपा महासमुंद, लखोली रेस्ट हाउस रायपुर, बालार अर्जुनी रेस्ट हाउस रायपुर, टूरिस्ट मोटल रायगढ़, कुनकुरी रेस्ट हाउस रायगढ़, खुमार पाकुट रेस्ट हाउस रायगढ़ मोटल सारागांव बिलासपुर, धरमपुरा रेस्ट हाउस बिलासपुर, गोंडख़ाम्ही रेस्ट हाउस बिलासपुर, खूंटाघाट रेस्ट हाउस बिलासपुर, खुडिय़ा रेस्ट हाउस बिलासपुर, टूरिस्ट मोटल जांजगीर-चांपा, मोटल छादिराम अंबिकापुर सरगुजा, मोटल चिरगुड़ा कोरिया, श्याम घुनघुट्टा रेस्ट हाउस अंबिकापुर, टूरिस्ट मोटल कोनकोना कोरबा, माचाडोली रेस्ट हाउस कोरबा टूरिस्ट मोटल राजिम, रेस्ट हाउस कुकदा गरियाबंद को ठेके पर दिया जाना है।
नैसर्गिक सौदर्य के लिहाज से छत्तीसगढ़ अद्वितीय है, लेकिन राज्य का पर्यटन विभाग इस सौंदर्य का देश और दुनिया को रसपान कराने में सफल नहीं हो पा रहा है। बस्तर से लेकर सरगुजा तक पूरे राज्य में प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा पड़ा है, लेकिन सरकार के पास इसके लिए कोई योजना नहीं है। राज्य के अभ्यारण्य लावारिसों की तरह हैं, यहां जंगली जानवर लगातार कम हो रहे हैं। वन्य पर्यटन के लिए कोई विशेष योजना नहीं है। वन्य पशुओं का अवैध रूप से हो रहा शिकार तो सरकार रोक नहीं पा रही है, बल्कि जंगलों के सफाए की ओर भी उसका ध्यान नहीं है। खनिज सम्पदा का दोहन और जंगलों का सफाया हो रहा है, जिसके भयावह नतीजे भी सामने आ रहे हैं। हथियों का कहर बरपाना, वन्य जीवों का गांवों और शहरों की ओर पलायन जैसे कारणों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। नतीजतन छत्तीसगढ़ का पूरा पर्यटन चौपट होने की कगार पर है। लेकिन बजाए इस ओर ध्यान देने के, सरकार और पर्यटन मंडल रूपए कमाने के तरीके निकाल रहा है। यह साबित करने की कुचेष्टा की जा रही है कि राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में बनाए गए होटल, और मोटल सरकार के लिए सफेद हाथी साबित हो रहे है। यही वजह है कि होटल-मोटल व रेस्टहाउसों को ठेके पर देने की तैयारी की जा रही है। करोड़ों रुपए खर्च कर बनाए गए सरकारी होटल, मोटल और रेस्ट हाउस अब निजी हाथों में जा रहे है। इसके लिए बाकायदा योजना बना ली गई है। जिसकी पहली प्रक्रिया 12 मार्च को शुरू होगी और 27 मार्च तक पर्यटन मंडल की 33 होटल, मोटल व रेस्ट हाउस को ठेके पर सौंप दिया जाएगा।
छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल ने मैनेजमेंट कांट्रेक्ट बेस में पहले चरण पर प्री-बिड कांफ्रेंस 15 मार्च को दोपहर तीन बजे मुख्यालय में आयोजित की गई है। इच्छुक लोगों को फार्म भी जारी कर दिया गया है। फार्म 12 मार्च को शाम पांच बजे तक जमा करने की ताकीद भी की गई है। दूसरे चरण यानी की फाइनेंशियल बिड 27 मार्च को शाम पांच बजे खोली जाएगी। यह सारी प्रक्रिया दुरस्तगी से की गई है पर फार्म की उपलब्धता सीमित हाथों में ही है।
नवनिर्मित और आशीशान होटल मोटल के कुल 12 समूह तैयार किए गए हैं। जिसमें कुल मिलाकर 33 स्थानों की होटल, रेस्ट हाउस व मोटल हैं। इसमें रायपुर ग्रुप की टूरिस्ट मोटल केंद्री, टूरिस्ट मोटल भाटागांव रेस्ट हाउस भाठागांव, कांकेर ग्रुप की नथिया नवागांव मोटल, टूरिस्ट मोटल कांकेर, टूरिस्ट मोटल कोंडागांव जगदलपुर की टूरिस्ट मोटल आसाना, टूरिस्ट मोटल तीरथगढ़, टूरिस्ट मोटल हाराम दंतेवाड़ा, मोटल खपरी दुर्ग, मोटल तुमड़ीबोड़ राजनांदगांव, तांदुला रेस्ट हाउस दुर्ग, कवर्धा मोटल, भोरमदेव रेस्ट हाउस कबीरधाम, मोटल कांपा महासमुंद, लखोली रेस्ट हाउस रायपुर, बालार अर्जुनी रेस्ट हाउस रायपुर, टूरिस्ट मोटल रायगढ़, कुनकुरी रेस्ट हाउस रायगढ़, खुमार पाकुट रेस्ट हाउस रायगढ़ मोटल सारागांव बिलासपुर, धरमपुरा रेस्ट हाउस बिलासपुर, गोंडख़ाम्ही रेस्ट हाउस बिलासपुर, खूंटाघाट रेस्ट हाउस बिलासपुर, खुडिय़ा रेस्ट हाउस बिलासपुर, टूरिस्ट मोटल जांजगीर-चांपा, मोटल छादिराम अंबिकापुर सरगुजा, मोटल चिरगुड़ा कोरिया, श्याम घुनघुट्टा रेस्ट हाउस अंबिकापुर, टूरिस्ट मोटल कोनकोना कोरबा, माचाडोली रेस्ट हाउस कोरबा टूरिस्ट मोटल राजिम, रेस्ट हाउस कुकदा गरियाबंद को ठेके पर दिया जाना है।
महिला आरक्षण विधेयक के बाद सम्पत्ति की घोषणा डाके पर डाका
रायपुर। महिला विधेयक से पहले से ही चिंतित छत्तीसगढ़ के मंत्रियों, विधायकों को अब एक नई चिंता सताने लगी है। यह चिंता सम्पत्ति की घोषणा को लेकर है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ ही भाजपा विधायकों की सम्पत्ति हर साल उजागर करने का ऐलान किया है और इसके सुर में सुर मिलाया है कांग्रेस ने। लेकिन भाजपा और कांग्रेस के विधायकों के माथे पर इस घोषणा से चिंता की रेखाएं खिंच आई है। इधर, आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों की सम्पत्तियों का ब्यौरा इंटरनेट पर जारी करने की सरकार की घोषणा से अफसरों के होश उड़े हुए हैं।
एक सामान्य कार्यकर्ता से नेता बनने और उसके बाद पार्टी का टिकट हासिल कर चुनाव लड़ऩे, लाखों रूपए खर्च करने के बाद चुनाव जीतने वाले नेता सम्पत्ति का ब्यौरा देने के थोपे गए निर्णय से काफी चिंतित हैं। उन्हें लगता है कि इस तरह की घोषणाओं से कुछ होने वाला नहीं है। एक विधायक के मुताबिक, इस घोषणा के चलते कुछ तकनीकी दिक्कतें पेश आ सकती है। यह दिक्कतें ऐसी हैं, जिनका कोई जवाब विधायक या मंत्री के पास नहीं होता। एक संसदीय सचिव की मानें तो पद पर आते ही आवक का पता नहीं चल पाता। किसी का कोई काम करवा दिया या डूबते हुए को पार लगा देने से ही काफी आवक हो जाती है। यह काम करवाने के ऐवज में लिया गया पारिश्रमिक होता है। फिर शासकीय कार्यों की कमीशन का कोई क्या हिसाब दे सकता है?
छत्तीसगढ़ की 90 सदस्यीय विधानसभा में महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बाद हालात पूरी तरह बदलने वाले हैं। यदि विधेयक पारित हो जाता है, (जो कि लगभग तय है) तो राज्य में कुल 30 महिलाएं विधायक होंगी। इतना ही नहीं, छत्तीसगढ़ की लोकसभा की 11 में से 4 सीटें महिलाओं के खाते में जा रही हैं। यह ऐसा मसला है, जिसे मंत्री, विधायक, नेता कोई पचा नहीं पा रहे हैं। इन नेताओं का लगता है कि यह उनके अधिकार पर डाके की तरह है। हालांकि पार्टी की नीतियों के तहत फिलहाल उन्होंने चुप्पी साध रखी है। अपना क्षेत्र आरक्षण की चपेट में आने की स्थिति के मद्देनजर वे अपनी पत्नी, पुत्री या रिश्तेदार के नाम पर विचार कर रही रहे थे कि अब उन पर एक और ऑफत थोप दी गई। दरअसल, विधानसभा में सरकार को घेरने से लिहाज से कांग्रेस विधायक धर्मजीत सिंह ने एक अफसर के पास मिली 400 करोड़ से अधिक की सम्पत्ति पर सवाल उठाया था। जिसके जवाब में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने न केवल अफसरों बल्कि मंत्रियों और विधायकों की सम्पत्ति सार्वजनिक करने की वकालत की। उन्होंने इस दौरान यहां तक कह दिया कि सार्वजनिक जीवन में सुचिता और ईमानदारी के लिए जरूरी है कि जनता को उनके बारे में तमाम जानकारी हो। इसके लिए यह आवश्यक है कि मंत्री और विधायक अपनी-अपनी सम्पत्तियों का ब्यौरा दें। उन्होंने अपनी ओर से अपने समेत मंत्रियों और भाजपा के विधायकों की सम्पत्तियों का ब्यौरा हर साल देने का ऐलान किया। नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे ने इसका स्वागत किया और हर साल बजट सत्र में कांग्रेस विधायकों द्वारा सम्पत्ति का ब्यौरा देने की बात कही।
मुख्यमंत्री के मुताबिक. यदि अफसरों की सम्पत्ति का ब्यौरा वेबसाइट पर उपलब्ध होगा तो लोगों को सूचना कानून के तहत बार-बार जानकारियां मांगने की जरूरत नहीं होगी। उन्होंने स्वीकार किया कि 31 जनवरी तक सम्पत्ति की घोषणा का स्पष्ट नियम होने के बावजूद कई अफसरों ने अपनी सम्पत्ति की जानकारी नही दी है। इनमें 2 आईएएस, 18 आईपीएस और 69 भारतीय वन सेना के अधिकारी हैं।
एक सामान्य कार्यकर्ता से नेता बनने और उसके बाद पार्टी का टिकट हासिल कर चुनाव लड़ऩे, लाखों रूपए खर्च करने के बाद चुनाव जीतने वाले नेता सम्पत्ति का ब्यौरा देने के थोपे गए निर्णय से काफी चिंतित हैं। उन्हें लगता है कि इस तरह की घोषणाओं से कुछ होने वाला नहीं है। एक विधायक के मुताबिक, इस घोषणा के चलते कुछ तकनीकी दिक्कतें पेश आ सकती है। यह दिक्कतें ऐसी हैं, जिनका कोई जवाब विधायक या मंत्री के पास नहीं होता। एक संसदीय सचिव की मानें तो पद पर आते ही आवक का पता नहीं चल पाता। किसी का कोई काम करवा दिया या डूबते हुए को पार लगा देने से ही काफी आवक हो जाती है। यह काम करवाने के ऐवज में लिया गया पारिश्रमिक होता है। फिर शासकीय कार्यों की कमीशन का कोई क्या हिसाब दे सकता है?
छत्तीसगढ़ की 90 सदस्यीय विधानसभा में महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बाद हालात पूरी तरह बदलने वाले हैं। यदि विधेयक पारित हो जाता है, (जो कि लगभग तय है) तो राज्य में कुल 30 महिलाएं विधायक होंगी। इतना ही नहीं, छत्तीसगढ़ की लोकसभा की 11 में से 4 सीटें महिलाओं के खाते में जा रही हैं। यह ऐसा मसला है, जिसे मंत्री, विधायक, नेता कोई पचा नहीं पा रहे हैं। इन नेताओं का लगता है कि यह उनके अधिकार पर डाके की तरह है। हालांकि पार्टी की नीतियों के तहत फिलहाल उन्होंने चुप्पी साध रखी है। अपना क्षेत्र आरक्षण की चपेट में आने की स्थिति के मद्देनजर वे अपनी पत्नी, पुत्री या रिश्तेदार के नाम पर विचार कर रही रहे थे कि अब उन पर एक और ऑफत थोप दी गई। दरअसल, विधानसभा में सरकार को घेरने से लिहाज से कांग्रेस विधायक धर्मजीत सिंह ने एक अफसर के पास मिली 400 करोड़ से अधिक की सम्पत्ति पर सवाल उठाया था। जिसके जवाब में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने न केवल अफसरों बल्कि मंत्रियों और विधायकों की सम्पत्ति सार्वजनिक करने की वकालत की। उन्होंने इस दौरान यहां तक कह दिया कि सार्वजनिक जीवन में सुचिता और ईमानदारी के लिए जरूरी है कि जनता को उनके बारे में तमाम जानकारी हो। इसके लिए यह आवश्यक है कि मंत्री और विधायक अपनी-अपनी सम्पत्तियों का ब्यौरा दें। उन्होंने अपनी ओर से अपने समेत मंत्रियों और भाजपा के विधायकों की सम्पत्तियों का ब्यौरा हर साल देने का ऐलान किया। नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे ने इसका स्वागत किया और हर साल बजट सत्र में कांग्रेस विधायकों द्वारा सम्पत्ति का ब्यौरा देने की बात कही।
मुख्यमंत्री के मुताबिक. यदि अफसरों की सम्पत्ति का ब्यौरा वेबसाइट पर उपलब्ध होगा तो लोगों को सूचना कानून के तहत बार-बार जानकारियां मांगने की जरूरत नहीं होगी। उन्होंने स्वीकार किया कि 31 जनवरी तक सम्पत्ति की घोषणा का स्पष्ट नियम होने के बावजूद कई अफसरों ने अपनी सम्पत्ति की जानकारी नही दी है। इनमें 2 आईएएस, 18 आईपीएस और 69 भारतीय वन सेना के अधिकारी हैं।
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