मंगलवार, 30 मार्च 2010

सरोज पाण्डेय होने के मायने

- नरेश सोनी -

भिलाई जैसे छोटे से क्षेत्र से राजनीति की शुरूआत करने वाली सरोज पाण्डेय आज दुर्ग संसदीय क्षेत्र की सांसद हैं और भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सचिव बनाई गई हैं। भारतीय जनता पार्टी ने जब उन्हें भिलाई से दुर्ग लाकर महापौर का टिकट दिया था, तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह सरोज इतने लम्बे समय तक खिला भी रह सकता है और न सिर्फ खिला रह सकता है बल्कि और लोगों को भी पल्लवित-पुष्पित करने में सहायक होगा। आज सांसद सरोज की पहचान एक मुखर वक्ता और बेहतरीन नेतृत्वकत्र्ता की है और शायद यही वजह है कि वे छत्तीसगढ़ की कद्दावर नेताओं में गिनीं जानें लगी हैं।
महापौर के अपने दस वर्षों के दो कार्यकाल में दुर्ग शहर का चेहरा बदलने वाली सरोज इस दौरान वैशाली नगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक और दुर्ग लोकसभा से सांसद भी निर्वाचित हुईं। ऐसे बिरले ही लोग होते हैं, जिन्हें इतने कम समय में ऐसी उपलब्धियां हासिल हों। जिस सरोज को महापौर का टिकट दिए जाने पर दुर्ग में विरोध के पुरजोर स्वर उभरे, आज उस दुर्ग में उनके समर्थकों की संख्या इस बात की गवाह है कि सरोज पाण्डेय होने के क्या मायने हैं।
बात सिर्फ सरोज पाण्डेय की उपलब्धियों और समर्थकों की संख्या तक ही नहीं है। इन दस वर्षों में जितने लोगों ने उन्हें समर्थन दिया, आज वे सत्ता या संगठन के अहम् पदों पर हैं। भाजपा या कांग्रेस में इस तरह की क्रांति पहले कभी नहीं आई। प्रत्येक उस नेता ने जिसका कद बढ़ गया, अपने समर्थकों को सिर्फ समर्थक तक ही सीमित रखा। उन्हें आगे बढ़ाने में कभी सहयोग नहीं किया। मोतीलाल वोरा और चंदूलाल चंद्राकर से लेकर दुर्ग जिले की राजनीति के अग्रज रहे चौबे बंधुओं के उदाहरण कांग्रेस में मौजूद हैं तो भाजपा में पूर्व सांसद ताराचंद साहू से लेकर वर्तमान में केबिनेट मंत्री हेमचंद यादव तक के नाम हैं। कांग्रेस के बनिस्बत् भाजपा का राजनीतिक सफर छोटा जरूर रहा है लेकिन दोनों ही पार्टियों में हालात् एक जैसे रहे। मोतीलाल वोरा के लिए तन, मन और धन लगाने वाले लोग लम्बे समय तक हाशिए पर रहे। वोरा की विरासत जब उनके पुत्र अरूण वोरा ने संभाली तो इन समर्थकों के समझ में आया कि अपनी जिंदगी वोरा परिवार को समर्पित करने के बाद उनके हाथ अब यह आया है कि वे पिता के बाद पुत्र की सेवा करें। नतीजतन वोरा के समर्थकों की संख्या बेहद तेजी से गिरी और वोरा की विरासत संभालने वाले उनके पुत्र अरूण वोरा तीन बार विधानसभा का चुनाव हार गए। तब जाकर मोतीलाल वोरा को समझ आया कि गड़बड़ कहां हो रही है। अब वे अपनी पुरानी गलतियों को सुधारने में लगे हैं। अपने एक करीबी समर्थक भजनसिंह निरंकारी को उन्होंने वैशाली नगर विधानसभा का टिकट दिलवाया तो एक अन्य समर्थक शंकरलाल ताम्रकार को दुर्ग से महापौर का टिकट दिलवाया। यह तो रही कांग्रेस की बात। लेकिन भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही। उसके 5 बार के सांसद ताराचंद साहू हमेशा अपने बंगले में कैद रहे और जातीयवादी राजनीति को बढ़ावा देते रहे। उनका कोई समर्थक खास मुकाम हासिल नहीं कर पाया। यहां तक कि साहू ने कभी अपने लोगों को संगठन में भी महत्व दिलवाना मुनासिब नहीं समझा।
तत्कालीन विधानसभा के अध्यक्ष और भिलाई के विधायक प्रेमप्रकाश पाण्डेय ने उनके खिलाफ मोर्चा खोला तब जाकर उन्हें भी अहसास हुआ कि सांसद होने के बावजूद वे किस जगह पर खड़े हैं। और इसी के बाद पहले अघोषित और फिर घोषित तौर पर युद्ध प्रारम्भ हो गया। इस युद्ध का नतीजा ताराचंद साहू को पार्टी से निष्कासन के रूप में भोगना पड़ा और अब वे छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच नाम के एक संगठन के बैनर तले अपने समर्थकों को एकजुट करने में लगे हैं। यह हालात कमोबेश वैसे ही हैं, जैसे मोतीलाल वोरा के साथ रहे। पद पर रहते और सत्तासुख भोगते इन्हें कभी अपने समर्थकों की याद नहीं आई। उन्होंने अपने तमाम समर्थकों के बावजूद अपने एक नौसिखिए पुत्र को साजा विधानसभा से टिकट दिलवाई तो पार्टी से बगावत कर अपनी पुत्री झमिता साहू को जिला पंचायत का अध्यक्ष बनवाया। उन्होंने जो कुछ किया, अपने और अपने परिवार के लिए।
दुर्ग से तीन बार विधायक और दो बार के केबिनेटमंत्री हेमचंद यादव भी मोतीलाल वोरा और ताराचंद साहू की राह पर हैं। सुख और आराम के तलबगार इस मंत्री को लेकर तरह-तरह की बातें होती है, बावजूद इसके अज्ञात कारणों से उन्हें साफ-सुथरी छवि का लबादा ओढ़ाया जाता रहा है। जिस मंत्री की सुुबह 10 बजे होती है और जो घर से 12 बजे निकलता है, ऐसे मंत्री के खिलाफ नाराजगी स्वाभाविक है। फरियादी चाहे अपने आवेदन लेकर घर के बाहर बैठे रहें, लेकिन मंत्रीजी का जो वक्त है, उससे पहले और बाद किसी के लिए कोई जगह नहीं है। इसीलिए उनके प्रति न केवल भाजपाइयों बल्कि दुर्ग के लोगों की भी नाराजगी बढ़ती गई और इसी का नतीजा है कि पिछले विधानसभा चुनाव में वे महज 700 वोटों के अंतर से ही जीत पाए। उनके कई समर्थक पिछले विधानसभा चुनाव में नाराज होकर इसलिए घर बैठ गए थे कि मंत्री ने हमारे लिए क्या किया?
इन तमाम नेताओं के विपरीत सरोज पाण्डेय ने सबसे पहले अपने समर्थकों की संख्या में इजाफा किया। भुखे भजन न होय गोपाला की तर्ज पर उन्होंने अपने संघर्ष के दिनों के साथियों को किसी न किसी पद पर स्थापित कराया। संगठन के साथ ही किसी न किसी लाभ के पद पर बैठाया। सरोज खुद प्रदेश महामंत्री और प्रवक्ता के पद पर रहीं और अब सांसद हैं, लेकिन उनके समर्थक उनके साथ बराबर बने हुए हैं। वैशाली नगर विधानसभा के उपचुनाव के दौरान जब संगठन ने उनका साथ छोड़ दिया और भिलाई के नेताओं ने उनके लिए काम करने से मना कर दिया तो दुर्ग के उनके समर्थकों ने मोर्चा संभाला। यह दीगर बात है कि आज भिलाई में उनके समर्थकों की संख्या दुर्ग से कहीं कम नहीं है। सरोज पाण्डेय होने के मायने यह भी है कि जिस दुर्ग नगर निगम को उन्होंने विकास कार्यों और सौंदर्य के लिहाज से प्रदेश में सर्वोच्च मुकाम पर पहुंचाया, आज उनकी गैरमौजूदगी में वह निगम कर्मचारियों की तनख्वाह को तरस रहा है और विकास कार्य को खैर ठप्प पड़े ही हैं। इन्हीं सरोज पाण्डेय की एक आवाज पर नगर निगम के कर्मचारी थर्राने लगने थे, लेकिन आज यही कर्मचारी स्वेच्छाचारी हो गए हैं और नगर निगम का काम एक बार फिर से पुराने ढर्रे पर आ गया है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्‍दर लिखा है नरेश भाई आपने, पुन: पढकर टिपियाता हूं.


    धन्‍यवाद.

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  2. आपका शुक्रगुज़र हूँ संजीव जी, कि आपकी वजह से ब्लॉग शुरू कर पाया और लिख भी रहा हूँ।
    धन्यवाद...

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  3. bahut sahi likha hai aapne, saroj pandeya ke scooter par pichhe baithne se lekar yahan tak ke safar par bhi kabhi likhiye....

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  4. सरोज पाण्डेय के महापौर से सांसद और राष्ट्रीय मंत्री तक के सफर को बहुत सुन्दर तरीके से आपने प्रस्तुत किया है । सरोज पाण्डेय के राजनीतिक क्षितिज में तेजी से उभरने से यह सिद्ध होता है कि प्रतिभा किसी की मोहताज नही होती और प्रतिभा को आगे बढऩे से कोई नही रोक सकता आज जब परिवारवाद पूरी राजनीतिक परिदृश्य पर जबरदस्त तरीके से हावी है ऐसे में बिना राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से आने वाली सरोज पाण्डेय का इस मुकाम पर पहुंचना उनकी अद्वितिय प्रतिभा और क्षमता को साबित करता है ।
    आपका लेख -सरोज पाण्डेय होने के मायने- महिला राजनीतिज्ञों के लिए विशेष रुप से पठनीय है ।
    राजेन्द्र पाध्ये- दुर्ग

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