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मंगलवार, 4 मई 2010

जहर चाटने के बाद छटपटाते रमन

- नरेश सोनी -

सामान्य बुद्धि का कोई भी व्यक्ति यह बेहतर जानता है कि जहर का सेवन कितना घातक होता है। शायद इसीलिए कांग्रेस इस जहर को चाटने से बचती रही है। उसे यह भलीभांति मालूम था और है कि इससे मौत भी हो सकती है। लेकिन छत्तीसगढ़ की नब्ज पर हाथ धरे बैठे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को शायद यह मालूम नहीं था कि 'यह गरल कितनी छटपटाहट देगा? नतीजतन उन्होंने यह गरल धारण कर लिया और अब जाहिर है कि परेशान हो रहे हैं।

मामला सिंह बनाम सिंह का है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के एक लेख का सार यह निकला कि वे अपनी ही केन्द्र सरकार के गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की नक्सल नीतियों से सहमत नहीं है। मसला क्योंकि छत्तीसगढ़ से भी जुड़ा था, इसलिए यहां के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का लाल-पीला होना लाजिमी था। तो बात यहां तक पहुंची कि डॉ. सिंह ने भी अखबारों में अपना लम्बा-चौड़ा लेख छपवा लिया। इस लम्बे-चौड़े लेख की भाषा से दिग्विजय सिंह ने असहमति जाहिर की और डॉ. रमन सिंह को एक पत्र लिख मारा। बस, छत्तीसगढ़ में अभी यही सब कुछ चल रहा है। दिग्विजय सिंह खुली चर्चा की चुनौती दे रहे हैं और डॉ. रमन सिंह उसे स्वीकार कर रहे हैं। दरअसल, डॉ. रमन सिंह 6 वर्षों से छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद के खात्मे के लिए प्रयासरत् रहे हैं। इसके लिए उन्हें लम्बी जुगत भी लगानी पड़ी। सबसे बड़ी समस्या जनमत तैयार करने की थी। इससे भी बड़ी समस्या केन्द्रीय मदद लेना थी। लेकिन केन्द्र सरकार नक्सलवाद को बड़ी समस्या मानने से ही हिचकती रही। तो सबसे पहले तो नक्सलवाद को सबसे बड़ी चुनौती साबित करना ही समस्या थी। इसमें कामयाबी मिली तो केन्द्र से मदद के दरवाजे खुल गए और नक्सलियों के खात्मे की तैयारियां भी शुरू हो गई। ऐसे में नक्सलियों का बौखलाना लाजिमी था। नतीजतन सलवा जुड़ूम से जुड़े लोगों, जवानों का कत्लेआम शुरू हो गया।

क्या कोई भी लड़ाई बिना कुर्बानी के नतीजे तक पहुंच सकती है? कांग्रेस ने लड़ाई लडऩे का कभी मन ही नहीं बनाया। वह कुर्बानियों से डरती रही। नतीजतन नक्सली फलते-फूलते और अपने को मजबूत करते रहे।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद ने गहरी जड़ें काफी पहले ही जमा ली थी। लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश की तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार हो या विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी, दोनों ने ही इन जड़ों को काटने के बजाए इससे परहेज करना ज्यादा मुनासिब समझा। यही वजह रही कि कांग्रेस के इस 10 वर्षीय (7 साल दिग्विजय सिंह, 3 साल अजीत जोगी) कार्यकाल में नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती रही और अपने आपको मजबूत करती रही। इस दौरान क्योंकि बस्तर के भीतरी इलाकों तक सरकार की पहुंच नहीं बन पाई (या फिर जानबूझकर इस इलाके को छुआ ही नहीं गया) इसलिए धीरे-धीरे पूरा बस्तर नक्सलियों की जद में आ गया। छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. रमन सिंह के सामने सिर्फ दो ही मसले थे। पहला राज्य का विकास और दूसरा नक्सलवाद से निपटने की चुनौती।

कई लोग यह सवाल उठाते रहे हैं कि जब राज्य में सब कुछ 'ठीक-ठाक चल रहा था तो नक्सलियों को 'उंगली क्यों की गई? पर यहां इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि नक्सलवाद कभी सामाजिक समस्या थी, पर बदलाव के साथ अब यह आपराधिक चुनौती बन चुकी है। किसी अपराधी का विरोध नहीं करने पर वह अपने को मजबूत करता चला जाता है और फिर कोई भी उससे बच नहीं पाता। नक्सलियों ने बस्तर के बीहड़ों से बाहर निकलकर शहरी क्षेत्रों में भी पैर पसारना शुरू कर दिया था। ऐसे में यदि डॉ. रमन सिंह की सरकार मुश्तैद नहीं होती तो नक्सली, शहरों में चुनौती देने की स्थिति में आ गए होते। राजधानी रायपुर भी नक्सलियों की आमद से अछूती नहीं रह गई थी। राजधानी के अलावा दुर्ग-भिलाई, राजनांदगांव, धमतरी जैसे इलाकों में नक्सलियों की धरपकड़ यह जाहिर करती है कि उनके मंसूबे क्या रहे होंगे। इसलिए कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से सहमति जाहिर करने से पहले यह भी विचार करना चाहिए कि नक्सलवाद जल्द ही शहरी क्षेत्रों के लिए भी चुनौती साबित होने जा रहा था। जिस बड़े पैमाने पर शहरों से असलहा बरामद हुआ और नक्सलियों के प्रवक्ता के भिलाई में रहने की सूचना मिली, उसका क्या मतलब था?

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शनिवार, 24 अप्रैल 2010

शहरों की ओर नक्सली

- प्रभात अग्रवाल -
बस्तर में बल के बढ़ते दबाव के चलते नक्सली शहरों की ओर पलायन करने लगे हैं। इस तरह की मिल रही गोपनीय सूचनाओं के बाद नक्सल प्रभावित जिलों के आसपास के इलाकों को सतर्क कर दिया गया है। सीमाओं पर चौकसी बरतने को भी कहा गया है। बस्तर के ताड़मेटला घटनाक्रम के बाद एक ओर जहां देशभर में लोगों ने गम्भीर प्रतिक्रिया जताई है तो दूसरी ओर राज्य और केन्द्र सरकार भी अब और ज्यादा सख्ती के मूड़ में है। हालातों को भांपकर नक्सलियों ने भी पैतरा बदल दिया है और अब वे शहरों की ओर रूख कर रहे हैं।
नक्सलियों द्वारा बस्तर में 76 जवानों की नृशंस हत्या के बाद सीआरपीएफ के जवान बीहड़ों में जाने से परहेज कर रहे हैं। हाल ही में यह खबर भी आई थी कि इन जवानों को खाने और साफ पानी की किल्लत से जूझना पड़ रहा है। मौसम की मार और मच्छरों की वजह से जवान पहले ही परेशान रहे हैं, वहीं नक्सलियों के हमलों की आशंका भी बराबर बनी रहती है। इस तरह की तमाम दिक्कतों के बाद अब केन्द्र और राज्य की सरकार मिलकर नए सिरे से योजनाएं बनाने और उसे मूर्त रूप देने में जुट गए हैं। लेकिन एक बात पूरी तरह से साफ हो गई है कि नक्सलियों के खिलाफ सेना और वायुसेना का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। दरअसल, इसके पीछे अपने कई कारण हैं। यदि सेना को बस्तर में तैनात किया जाता है तो पूरा बस्तर सैन्य शासन के दायरे में आ जाएगा और इस पूरे संभाग में सेना की मर्जी के बिना कोई काम नहीं हो पाएगा। इससे बस्तर के विकास और वहां के जनजीवन पर भी असर पडऩे की संभावना है, वहीं सेना के कोप का शिकार उन आदिवासियों को होना पड़ेगा, जो नक्सलियों के भय की वजह से जाने-अनजाने उन्हें प्रश्रय या किसी न किसी तरह का सहयोग करते रहे हैं। इसलिए अब नए सिरे से नई रणनीति के तहत फूंक-फूंककर कदम धरने की जरूरत है।
इधर, ताड़मेटला घटना के बाद जवानों की हौसला अफजाई के लिए डीजीपी विश्वरंजन ने पत्र लिखा है। अपने पत्र में उन्होंने ताड़मेटला घटना से सबक लेने और भविष्य में सर्चिंग अभियान के दौरान सावधानी बरतने की बात कही है। एक ओर जहां केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् तीन साल के भीतर नक्सलियों के खात्मे की बात कह रहे हैं तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह दो साल में छत्तीसगढ़ को नक्सलियों से मुक्त करने का दावा कर रहे हैं। इस तरह की बातों और दावों का जवाब नक्सली अपने प्रचलित तरीके से ही दे रहे हैं। ताड़मेटला घटना की जांच करने पहुंचे केन्द्रीय दल पर नक्सलियों ने गोलियां बरसाईं तो बस्तर के डिलमिली में जिस तरह उन्होंने रेल पटरियां उखाड़कर मालगाड़ी के 13 डिब्बे उतार दिए, उससे रेल यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ और करोड़ों रूपयों का नुकसान भी हुआ। वास्तव में, जब-जब नक्सलियों के खात्मे जैसे बयान आते हैं, वामपंथी उग्रवादी कोई न कोई बड़ी घटना को अंजाम देते हैं। इसलिए राजनेताओं को किसी तरह का बयान देने से पूर्व सावधानी बरतना भी जरूरी है। मालगाड़ी की पटरियां उतारकर नक्सलियों ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि उनकी गतिविधियों पर विराम नहीं लगा है। ....और इन सबके बाद अब नक्सलियों के शहरी क्षेत्रों में कूच करने की खबरें भयभीत करने वाली हैं। कुछ अरसा पहले राजधानी रायपुर और भिलाई क्षेत्र से कई बड़े नक्सली समर्थकों को असलहे के साथ गिरफ्तार किया गया। तब पहली बार यह पता चला कि नक्सली सिर्फ बीहड़ों ही नहीं, शहरों में भी काम कर रहे हैं।
फिलहाल बस्तर के लिए एक नई खबर सामने आई है कि वहां जनगणना का कार्य नहीं हो पाएगा। नक्सली आतंक के चलते यह संभव भी नहीं दिख रहा है। इसलिए प्रशासन ने वहां जनगणना के लिए कोई नया उपाय सुझाने संबंधी पत्र लिखा है। लेकिन बस्तर जैसे जटिल और विस्तृत क्षेत्र में कोई नया उपाय काम करेगा, इस बात की संभावना कम ही है। दरअसल, नक्सलियों के भय से मतगणना कर्मी गांवों में जाना नहीं चाहते। नतीजतन बस्तर के सभी 4 जिलों में यहब कार्य पहले से ही ठंड़ा पड़ा हुआ है। इधर, कांग्रेस ने सुरक्षा बलों में पारस्परिक तालमेल के लिए राजभवन में नोडल अफसर की नियुक्ति का सुझाव दिया है। राज्यपाल से चर्चा करने पहुंचे कांग्रेसियों का कहना था कि प्रत्येक नक्सली वारदात के बाद सरकार रणनीतिक चूक का रटा-रटाया जवाब देती है और नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब देने की बात कही जाती है, लेकिन आज तक ऐसा हो नहीं पाया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष धनेन्द साहू ने कहा कि बस्तर में जनजीवन सामान्य नहीं है। आदिवासियों की खेती-बाड़ी चौपट हो गई है। हाट-बाजार बंद पड़े हैं। आदिवासी वनोपज नहीं बेच पा रहे हैं। रोजगार गारंटी योजना समेत तमाम सरकारी कामकाज बंद पड़े हैं। नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे का कहना था कि नक्सल समस्या पर प्राथमिकता के आधार पर ध्यान देने की जरूरत है।
                                             नोट : लेखक राष्ट्रीय साप्ताहिक विदर्भ चंडिका के छत्तीसगढ़ ब्यूरो प्रमुख हैं।

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

सैन्य कार्यवाही से परहेज़ क्यों?

- नरेश सोनी -

बस्तर में कत्लेआम के बाद भी केन्द्र सरकार नक्सलियों के खिलाफ सैन्य कार्यवाही से परहेज कर रही है, जबकि वहां तैनात जवानों को यह भलीभांति मालूम है कि नक्सलियों के ठिकाने कहां है। यदि इन ठिकानों को नेस्तनाबूत करने वायुसेना की मदद ली जाए तो जाहिर तौर पर न केवल नक्सलियों का सफाया होगा, बल्कि उन करोड़ों रूपयों की बचत भी हो पाएगी, जो जवानों और आपरेशन को अंजाम देने के लिए व्यय किए जा रहे हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम इस अभियान को तीन साल चलाने के मूड़ में लगते हैं, जब नक्सलियों का सफाया इससे पहले हो सकता है तो फिर लम्बा-चौड़ा खर्च करने और जवानों की जान जोखिम में डालने की जरूरत क्या है? वास्तव में केन्द्र और राज्य की सरकारों में नक्सलियों के सफाए का माद्दा नजर नहीं आ रहा है। सवाल यह है कि जब बिना जवानों की जान गँवाए नक्सलियों का वायुसेना की मदद से ही सफाया हो सकता है तो फिर विलम्ब और इंतजार किसलिए?

दरअसल, विश्व बिरादरी में अपनी साख के फेर में केन्द्र की सरकार देश के भीतर सैन्य कार्यवाही से बचती रही है। जम्मू-कश्मीर में पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने जो गलतियां की थी, वही गलतियां अब डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार करने जा रही है। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि हजारों लोगों को मौत से बचाना और अरबों रूपयों के संभावित व्यय से बचना ज्यादा जरूरी है या फिर विदेशों में अपनी साख? पं. नेहरू की गलतियों का खामियाजा आज भी जम्मू कश्मीर की अवाम भुगत रही है और अब तक कश्मीर में भारत का सम्पूर्ण शासन स्थापित नहीं हो पाया है। वहां अब भी सैन्य कार्यवाही नहीं की जा रही है। नक्सली जिस तरह से एक बड़े इलाके पर काबिज हो गए हैं, उससे यही लगने लगा है कि कहीं यहां भी वैसे ही हालत निर्मित न हो जाए। बस्तर के भीतरी इलाके आज भी सरकार की पहुंच से दूर है और वहां नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती है। वन माफियाओं से लेकर, ट्रांसपोर्टरों, व्यवसायियों और कथित तौर पर नेताओं तक से नक्सली चंदा वसूलते हैं। खबर यह भी है कि नक्सली गांजा आदि की खेती भी करवा रहे हैं। इस पर अंकुश लगाना सरकार के बस में नहीं दिख रहा है, जबकि इसी चंदे आदि की बदौलत नक्सली हथियार और गोलाबारूद खरीद रहे हैं और कत्लेआम कर रहे हैं। नक्सलियों के खिलाफ अभियान शुरू होने से पहले जवानों को तमाम तरह के प्रशिक्षण दिए गए हैं। गोरिल्ला युद्ध से लेकर जंगलवार तक से प्रशिक्षित होने के बाद भी जवानों की जान ऑफत में है। ऐसे में बस्तर समेत उन तमाम राज्यों में सैन्य कार्यवाही जरूरी हो जाती है, जो नक्सलियों से बुरी तरह त्रस्त हैं।

भले ही बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ चल रहा अभियान राज्य की भाजपा और केन्द्र की कांग्रेसनीत सरकार का संयुक्त आपरेशन है, लेकिन पिछले कुछ महीनों में जो कुछ निकलकर सामने आता रहा है, वह यह है कि भाजपा इस कोशिश में लगी है कि उसका वोटबैंक प्रभावित न हो तो कांग्रेस एक बार फिर अपने वोटबैंक को सुरक्षित करने की जुगत में है। और वोटबैंक-वोटबैंक के इस खेल में आतंक का पर्याय बन बैठे नक्सलियों का शिकार हो रहे हैं वे जवान, जिन्हें बिना किसी ठोस योजना के मौत के मुंह में झोंक दिया गया है। अद्र्धसैनिक बलों के साथ ही पुलिस और एसपीओ के जवान जब लगातार मर रहे हैं और नक्सलियों पर नकेल कसने में कोई सफलता नहीं मिल पा रही है तो केन्द्र और राज्य की सरकारें ठोस निर्णय क्यों नहीं ले पा रहे हैं? सेना के उपयोग पर केन्द्र सरकार को आपत्ति क्यों है और क्यों हवाई हमले नहीं हो सकते, जबकि नक्सलियों के ठिकानों की ठीक-ठीक जानकारियां जुटा ली गई है? केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम कह गए हैं कि छत्तीसगढ़ में ग्रीनहंट नाम का कोई आपरेशन नहीं चल रहा है। जबकि राज्य के तमाम आला पुलिस अफसर बार-बार आपरेशन ग्रीनहंट की बातें करते रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर बस्तर में चल क्या रहा है? क्यों नहीं नक्सलियों के खिलाफ आरपार की लडाई छेड़ी जाती? हमले में घायल हुए जवानों के मुताबिक, नक्सलियों के कैंप के बारे में तमाम अफसरों के पूरी जानकारी है। किस जगह कितनी संख्या में नक्सलियों का जमावड़ा है और उनके पास कौन-कौन से हथियार है, जब इसकी जानकारियां हैं तो बड़े कदम उठाने में परहेज क्यों किया जाता है? नक्सलियों के ठिकानों पर हवाई हमले होने से जवानों को अकारण जान भी नहीं गंवानी पड़ेगी। इससे वक्त की बर्बादी भी बचेगी और जवानों पर खर्च होने वाला रूपया भी।

प्रत्येक नक्सली घटना का जिम्मा खुफिया तंत्र और रणनीतिक चूक पर मढ़ दिया जाता है। आखिर यह क्यों नहीं देखा जाता कि जंगलों में नक्सलियों का राज है और वहां जंगल का ही कानून चलता है कि जो हमारे साथ नहीं है, व हमारा दुश्मन है। अपने बेहतर नेटवर्क के जरिए नक्सली पुलिस के मुखबिरों को चुन-चुन और सरेआम मारते हैं। ऐसे में कहां का खुफिया तंत्र और कैसे मुखबिर?

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मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

सबसे बड़ा हमला, 70 जवान शहीद


देश के इतिहास का सबसे बड़ा हमला करते हुए नक्सलियों ने आज छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में 70 से ज्यादा जवानों को मौत की नींद दिया। मृतकों में सीआरपीएफ का 1 डिप्टी कमांडेंट भी शामिल है। हमले में 20 से ज्यादा जवानों के गम्भीर रूप से घायल होने की खबर है। जबकि वारदात के बाद से करीब 50 जवान लापता बताए जा रहे हैं। फिलहाल दंतेवाड़ा जिले के 6 अलग-अलग ठिकानों पर सुरक्षा बल और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ जारी है। नक्सली हमले की रक्षामंत्री पी. चिदम्बरम और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने निंदा की है। नक्सल इतिहास की इस सबसे बड़ी वारदात के पश्चात आज ही राजधानी रायपुर में आपात बैठक बुलाई गई। इस बैठक में केन्द्र सरकार के प्रतिनिधियों के अलावा मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, सीआरपीएफ के प्रतिनिधि और प्रदेश के आला पुलिस अफसरों के साथ ही गृह सचिव, डीजीपी, और मुख्य सचिव शामिल हुए।
सूत्रों के अनुसार आज सुबह चिंतागुफा थाने से पुलिस का संयुक्त बल सर्र्चिंग के लिए चिंतलनार की ओर रवाना हुआ था। ग्राम ताड़मेटला के समीप जंगल में घात लगाए बैठे नक्सलियों ने पुलिस पार्टी पर हमला कर दिया। सूत्रों के अनुसार नक्सली का यह हमला पूरी तरह सुविचारित और योजनाबद्ध था। पुलिस पार्टी कल शाम सर्चिग के लिए रवाना हुई थी जिसे आज सुबह लौटना था। इसीलिए नक्सलियों ने उन पर हमले की पूरी तैयारी कर रखी थी। नक्सली शहीद जवानों के हथियार भी लूटकर ले गए। बताया जाता है कि चिंतननार के ताड़केटला में नक्सलियों ने पहले घात लगाकर हमला किया। इस हमले में घायल हुए जवानों को लेने जब सीआरपीएफ के जवान एंटी लैंडमाइन व्हीकल से ताड़केटला जा रहे थे, इसी दौरान नक्सलियों ने दूसरा हमला बोलते हुए एंटी लैंडमाइन वाहन को उड़ा दिया। बताया जाता है कि मुठभेड़ में नक्सलियों से जूझ रहे बल को मदद देने चिंतलनार से अतिरिक्त पुलिस बल एंटी माईंस व्हीकल से रवाना किया गया था। यह बल लगभग दो किलोमीटर दूर आगे बढ़ा ही था कि नक्सलियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट कर दिया। विस्फोट में बुलेट पू्रफ वाहन पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई है। इस विस्फोट में चालक सहित एक जवान शहीद हो गए। इस बीच दोरनापाल से भी मुठभेड़ स्थल की ओर पुलिस बल रवाना हुआ था, जिस पर घाटी के पास नक्सलियों ने हमला कर दिया। बताया जाता है कि वारदात को अंजाम देने के लिए करीब 1000 नक्सली पहले से ही तैयार बैठे थे। सभी मृतक और घायल जवान 62वीं बटालियन के जवान हैं। घायलों को लाने के लिए जगदलपुर से हेलीकाप्टर रवाना किया, जिसके पश्चात बारी-बारी से घायल जवानों को चिंतलनार लाया गया। यहां से घायलों की स्थिति को देखते हुए उन्हें जगदलपुर और रायपुर के अस्पताल रवाना किया गया।
यहां यह उल्लेख करना लाजिमी होगा कि लगभग तीन वर्ष पूर्व बीजापुर जिले के रानीबोदली में नक्सलियों ने मध्य रात्रि में पुलिस कैम्प पर धावा बोलकर 55 जवानों को मौत की नींद सुला दिया था। इधर, गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने आज दिल्ली मे घटना की निंदा की। उन्होंने मृतकों की संख्या और बढऩे की आशंका भी जताई। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने नक्सली हमले की निंदा करते हुए घटना को दुखद बताया। उन्होंने कहा कि यह नक्सल हिंसा की पराकाष्ठा है। नक्सलियों ने हिंसा और अराजकता की सारी सीमाएं पार कर ली है। आज की वारदात से नक्सलियों का असली चेहरा बेनकाब हुआ है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे ने भी घटना की पुरजोर निंदा की है। उन्होंने कहा कि यह वक्त आलोचना करने का नहीं है। जवानों ने पूरा शौर्य दिखाया है। श्री चौबे ने कहा कि बिना किसी योजना के जवानों को बीहड़ों में नहीं भेजा जाना चाहिए।