35 रूपए में लेना है तो ले, उससे कम नहीं होगा। कंडरा बस्ती की उस महिला के मुंह से ऐसे कटु शब्द सुनकर उस आदमी का चेहरा बेचारगी की हद पार कर गया। उसने बेबस नजरों से महिला को देखा, पर महिला के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
आज सुबह आफिस के लिए निकलने गाड़ी उठाई तो उसने जवाब दे दिया। ..तो आज पैदल ही निकल पड़ा। घर से दफ्तर बहुत दूर नहीं है। रास्ते में ही कंडरा बस्ती पड़ती है। इसी बस्ती से गुजरते वक्त इस भीषण गर्मी में भी हाथ बांधकर खड़े एक अधेड़ पर मेरी नजर गई। सिर पर छोटे-छोटे बाल थे जो पूरी तरह भीग चुका था। वहां से पसीने की बूंदे उसके चेहरे पर आड़ी-तिरछी लकीरें बनाकर उसकी चमक खो चुकी सफेद कमीज पर गिरकर यहां-वहां बिन्दू बना रही थी। कमीज अस्त-व्यस्त थी और कमीज के नीचे उसने एक गमछा लपेट रखा था। एक दुबलाया, मरियल-सा अधेड़। पैर पर चप्पल भी नहीं थी। आंखों में नशा छाया हुआ था और पहली ही बार में देखकर कोई भी कह सकता था कि यह आदमी रातभर सोया नहीं है।
मुझे समझते देर नहीं लगी कि माजरा क्या है। इसी कंडरा बस्ती में एक भाजपा का छोटा नेता भी रहता है। पूरी स्थिति पर नजर रखने मैंने उस भाजपा नेता को आवाज लगाई और वहीं खड़ा हो गया।
दे दे दीदी.. 35 रूपया कहां ले लाव.. 22 ठन रूपया धरे हव। दे दे बहिनी...। उसके शब्दों में दर्द था और वह बुरी तरह गिड़गिड़ा रहा था। ..पर महिला को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। वह वापस भीतर चली गई तो अधेड़ वहीं हाथ बांधे उस दरवाजे पर टकटकी लगाए खड़ा उसके बाहर निकलने का इंतजार करने लगा।
क्या हो गया? - मैंने पूछा तो उसने मेरी तरफ देखे बिना ही जवाब दिया- कुछु नई..।
मैंने कुरेदने के से अंदाज में कहा - क्या मैं कोई मदद कर सकता हूँ?
उसने पहली बार दरवाजे से नजरें हटाई और मेरी ओर देखने लगा। उसकी आंखों में पानी उतर आया और पसीने की बूंदों के साथ मिलकर कहीं खो गया। नि:संदेह उसे मदद की जरूरत थी और मेरी ओर से हुई पहल पर उसकी आस बंध गई थी।
क्या बात है? मुझे बताओ... शायद मैं कोई मदद कर पाऊं?
चार महीने से बीमार हूं। घरवाली झाड़ू-पोंछा कर कमाती थी, पर कल शाम वह भी गुजर गई। - उसने कहा - मेरे शरीर में प्राण नहीं बचे। चलने और बात करने में तकलीफ होती है। घर में कुछ नहीं है। घरवाली का संस्कार कैसे करूं?
उसने बोलना बीच में रोककर मेरी आंखों में कुछ तलाशा और संतुष्ट होकर आगे कहने लगा - किसी तरह 22 रूपए लेकर आया हूं। पर काठी के लिए एक बांस 40 रूपए में दे रहे हैं। कहती है कि 5 रूपए कम कर दूंगी।
अब तक वह छुटभैय्या नेता भी आ गया था। मैंने अलग ले जाकर उससे बात की। अपनी ओर से कुछ रूपए दिए और उसे तमाम हालात बताकर काठी के लिए पूरे बांस की व्यवस्था करने को कहा।
घड़ी देखी तो 11 बज रहे थे। मुझे 10 बजे दफ्तर पहुंचना था। मैंने अपनी जेब में हाथ डालकर पर्स निकाला और 100 रूपए का एक नोट उस अधेड़ के हाथ में पकड़ा दिया। बिना उसे देखे, बिना मुड़े मैं आगे बढ़ गया।