शुक्रवार, 7 मई 2010

अटका-मटका, मारो-फटका

अपन ने अपने ब्लाग का वर्ग बदल लिया है। क्या करें, मजबूरी थी। भाई-दीदी लोग टिप्पणी करने में भी कंजूसी कर रहे थे। कंजूसी क्या कर रहे थे, समाचारों को पसंद नहीं कर पा रहे थे। अब जब पसंद ही नहीं आएगा तो टिप्पणी क्या खाक करेंगे? ...तो इसलिए फुल एंड फाइनल अब छत्तीसगढ़ खबर में

मौज और मस्ती
चायपत्ती सस्ती
पुराने विचार नस्ती।

पिछले तीन महीनों से लगातार ब्लाग पढऩे और शीर्ष पर चढऩे वाले ब्लागों को देखने के बाद यह नतीजा निकला है कि अब मैं भी

अटका-मटका
मारो-फटका
झूमो-झटका
उठाओ-पटका
आओ-खाओ
पिओ-सुस्ताओ
सोओ-मस्ताओ...

..टाइप का कुछ लिखने की कोशिश करूंगा। क्षमा कीजिएगा, पर कोशिश करूंगा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आज से पहले कभी इस तरह की चीजें लिखी नहीं है। जानता हूं कि इसके बाद भी कोई गारंटी नहीं है पसंद ही किए जाएं, पर रिस्क लेने में खर्च क्या होना है? तो मित्रों, आज से अपन भी नए सिरे से मैदान में उतर रहे हैं। स्वागत नहीं करेंगे क्या?

मंगलवार, 4 मई 2010

जहर चाटने के बाद छटपटाते रमन

- नरेश सोनी -

सामान्य बुद्धि का कोई भी व्यक्ति यह बेहतर जानता है कि जहर का सेवन कितना घातक होता है। शायद इसीलिए कांग्रेस इस जहर को चाटने से बचती रही है। उसे यह भलीभांति मालूम था और है कि इससे मौत भी हो सकती है। लेकिन छत्तीसगढ़ की नब्ज पर हाथ धरे बैठे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को शायद यह मालूम नहीं था कि 'यह गरल कितनी छटपटाहट देगा? नतीजतन उन्होंने यह गरल धारण कर लिया और अब जाहिर है कि परेशान हो रहे हैं।

मामला सिंह बनाम सिंह का है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के एक लेख का सार यह निकला कि वे अपनी ही केन्द्र सरकार के गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की नक्सल नीतियों से सहमत नहीं है। मसला क्योंकि छत्तीसगढ़ से भी जुड़ा था, इसलिए यहां के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का लाल-पीला होना लाजिमी था। तो बात यहां तक पहुंची कि डॉ. सिंह ने भी अखबारों में अपना लम्बा-चौड़ा लेख छपवा लिया। इस लम्बे-चौड़े लेख की भाषा से दिग्विजय सिंह ने असहमति जाहिर की और डॉ. रमन सिंह को एक पत्र लिख मारा। बस, छत्तीसगढ़ में अभी यही सब कुछ चल रहा है। दिग्विजय सिंह खुली चर्चा की चुनौती दे रहे हैं और डॉ. रमन सिंह उसे स्वीकार कर रहे हैं। दरअसल, डॉ. रमन सिंह 6 वर्षों से छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद के खात्मे के लिए प्रयासरत् रहे हैं। इसके लिए उन्हें लम्बी जुगत भी लगानी पड़ी। सबसे बड़ी समस्या जनमत तैयार करने की थी। इससे भी बड़ी समस्या केन्द्रीय मदद लेना थी। लेकिन केन्द्र सरकार नक्सलवाद को बड़ी समस्या मानने से ही हिचकती रही। तो सबसे पहले तो नक्सलवाद को सबसे बड़ी चुनौती साबित करना ही समस्या थी। इसमें कामयाबी मिली तो केन्द्र से मदद के दरवाजे खुल गए और नक्सलियों के खात्मे की तैयारियां भी शुरू हो गई। ऐसे में नक्सलियों का बौखलाना लाजिमी था। नतीजतन सलवा जुड़ूम से जुड़े लोगों, जवानों का कत्लेआम शुरू हो गया।

क्या कोई भी लड़ाई बिना कुर्बानी के नतीजे तक पहुंच सकती है? कांग्रेस ने लड़ाई लडऩे का कभी मन ही नहीं बनाया। वह कुर्बानियों से डरती रही। नतीजतन नक्सली फलते-फूलते और अपने को मजबूत करते रहे।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद ने गहरी जड़ें काफी पहले ही जमा ली थी। लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश की तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार हो या विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी, दोनों ने ही इन जड़ों को काटने के बजाए इससे परहेज करना ज्यादा मुनासिब समझा। यही वजह रही कि कांग्रेस के इस 10 वर्षीय (7 साल दिग्विजय सिंह, 3 साल अजीत जोगी) कार्यकाल में नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती रही और अपने आपको मजबूत करती रही। इस दौरान क्योंकि बस्तर के भीतरी इलाकों तक सरकार की पहुंच नहीं बन पाई (या फिर जानबूझकर इस इलाके को छुआ ही नहीं गया) इसलिए धीरे-धीरे पूरा बस्तर नक्सलियों की जद में आ गया। छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. रमन सिंह के सामने सिर्फ दो ही मसले थे। पहला राज्य का विकास और दूसरा नक्सलवाद से निपटने की चुनौती।

कई लोग यह सवाल उठाते रहे हैं कि जब राज्य में सब कुछ 'ठीक-ठाक चल रहा था तो नक्सलियों को 'उंगली क्यों की गई? पर यहां इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि नक्सलवाद कभी सामाजिक समस्या थी, पर बदलाव के साथ अब यह आपराधिक चुनौती बन चुकी है। किसी अपराधी का विरोध नहीं करने पर वह अपने को मजबूत करता चला जाता है और फिर कोई भी उससे बच नहीं पाता। नक्सलियों ने बस्तर के बीहड़ों से बाहर निकलकर शहरी क्षेत्रों में भी पैर पसारना शुरू कर दिया था। ऐसे में यदि डॉ. रमन सिंह की सरकार मुश्तैद नहीं होती तो नक्सली, शहरों में चुनौती देने की स्थिति में आ गए होते। राजधानी रायपुर भी नक्सलियों की आमद से अछूती नहीं रह गई थी। राजधानी के अलावा दुर्ग-भिलाई, राजनांदगांव, धमतरी जैसे इलाकों में नक्सलियों की धरपकड़ यह जाहिर करती है कि उनके मंसूबे क्या रहे होंगे। इसलिए कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से सहमति जाहिर करने से पहले यह भी विचार करना चाहिए कि नक्सलवाद जल्द ही शहरी क्षेत्रों के लिए भी चुनौती साबित होने जा रहा था। जिस बड़े पैमाने पर शहरों से असलहा बरामद हुआ और नक्सलियों के प्रवक्ता के भिलाई में रहने की सूचना मिली, उसका क्या मतलब था?

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गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

कौन मैली कर रहा है यह गंगा

एक बार फिर कुछ विघ्नसंतोषी गंगा को मैली करने पर तुल गए हैं। पता नहीं कौन-सा खेल है, पर इस खेल का नतीजा नहीं आना चाहिए, अन्यथा एक सुंदर और पवित्र मंशा को लेकर आगे बढ़ रहा ब्लाग सागर पूरी तरह से गंदा हो जाएगा।
पिछले कई दिनों से लगातार देख और पढ़ रहा हूं। ...और अब न चाहते हुए भी लिखना पड़ रहा है। साथियों, लम्बे प्रयासों के बाद मुझे हिन्दी में ब्लागिंग करने का अवसर मिला और तब सोचा था कि इस बहाने कई लोगों से सम्पर्क करने और अपनी बातों को बहुसंख्य तक पहुंचाने का अवसर मिल पाएगा। मुझे लगता है कि ऐसा औरों ने भी सोचा होगा। इस तरह एक जैसी पवित्र सोच लेकर हजारों लोग आगे बढ़ रहे हैं। पर लगता है कई खरगोशों को कछुओं की रफ्तार कुछ ज्यादा ही नजर आ रही है। उन्हें डर है कि यदि वे कहीं कमजोर पड़े तो कछुए एक बार फिर जीत हासिल कर लेंगे। पंचतंत्र की इस खरगोश और कछुए वाली कहानी से शायद ही कोई भारतीय अपरिचित होगा। पर इसी के साथ मैं अपने साथियों को एक बात और बताना चाहूंगा। एक कथित ब्लागर मित्र (कथित इसलिए कि उसकी गतिविधियों बिलकुल शून्य है, पर अपने सम्पर्कों तक लिंक पहुंचाने में वह चूक नहीं करता, भले ही उसके ब्लाग में सालभर पहले की पोस्ट पड़ी हुई हो।) ने कल ही मुझे बताया कि ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत में जाकर वह लेखों को बिना पढ़े ही टिप्पणी कर रहा है। ...और यह भी कि कई बड़े चिट्ठाकारों पर उसने नकारात्मक और बकवास किस्म की टिप्पणियां की है। (निवेदन है कि इस कथित ब्लागर का नाम न पूछें।) बहरहाल, मैंने इन सज्जन को अपनी और अन्य ब्लागर साथियों की भावनाओं से अवगत करा दिया है और उससे वायदा भी लिया है कि आइंदा वह इस तरह की हरकत नहीं करेगा।
साथियों, ब्लाग जगत में कई ऐसे लोग भी सक्रिय है, जिनका लिखने और पढऩे से कहीं कोई वास्ता नहीं है। ऐसे लोग महज मजा लेने के लिए आते हैं और मजा लेने के लिए उट-पटांग टिप्पणियां और नापसंदगी का चटखा लगा जाते हैं। मैं यह नहीं कहता कि सिर्फ ऐसे ही लोग ब्लाग-सागर को गंदा कर रहे हैं। संभव है कि सक्रिय किस्म के लोग भी ऐसा कर रहे हों, जैसा कि मैंने खरगोश और कछुए की कहानी के माध्यम से बताने का प्रयास किया है। इस बारे में ज्यादा कुछ इसलिए भी नहीं कहूंगा कि मुझे किसी पचड़े में नहीं पडऩा है। मैं एक शुद्ध और बेहतर सोच लेकर आगे बढऩा चाहता हूं। किसी की बुराई कर या व्यर्थ की बातें लिखकर अपने चिट्ठों में टिप्पणियों की संख्या बढ़ाने पर मेरा विश्वास नहीं है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, वे करते हैं।

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

खबरें इधर-उधर की

सफेदा लगाकर बदल डाला

रायगढ़। दिवंगत व्यक्ति के नाम पर तहसीलदार न्यायालय से जारी काम रोको आदेश पर सफेदा लगाकर मृतक के पुत्र के नाम पर आदेश तामिल करा लेने का अजीबो-गरीब मामला सामने आया है। जबकि आदेश तामिली के एक दिन बाद तहसीलदार न्यायालय में संशोधन आदेश हेतु आवेदन लगाया गया।
एक राजस्व प्रकरण में तहसीलदार एस.पी.वैद्य के न्यायालय में रा.प्र.क्र. 522/अ-70/09-10 में काम रोको आदेश पारित किया गया। जिसमें दादू बिल्डर्स के  अशोक अग्रवाल के नाम से स्वयं के लेटरपेड में दो रूपये की टिकट लगाकर वैधानिक प्रक्रिया पूर्ण किये बिना ही शीशधर बाजपेयी (मृत व्यक्ति) के विरूद्ध आवेदन पत्र प्रस्तुत कर यह आरोप लगाया गया कि उक्त मृत व्यक्ति द्वारा दादू बिल्डर्स का मार्ग अवरूद्ध कर भूमि पर अतिक्रमण किया जा रहा है। इस तरह निजी व्यक्ति द्वारा निजी लेटरहेड पर लगाए गये आवेदन पर तहसीलदार द्वारा बिना किसी जानकारी लिये अथवा संबंधित अन्य दस्तावेजों का अवलोकन किये ही आवेदन पर काम रोको आदेश जारी कर दिया गया। आदेश की प्रति लेकर दादू बिल्डर्स के कर्मचारी जे.एन. भारद्वाज के साथ तहसील कोर्ट के माल जमादार जब मृतक शीशधर बाजपेयी के पते पर पहुंचे तो उनके पुत्र द्वारा नोटिस को नहीं लेते हुए बताया गया कि यह नोटिस मृत व्यक्ति के नाम पर है जिस पर वापस चले गये किन्तु आधे घंटे बाद उक्त दोनो व्यक्ति एक साथ पुन: वापस आये और शीशधर बाजपेयी वाली नोटिस में शीशधर के नाम के ऊपर सफेदा लगाकर उसमें प्रमोद बाजपेयी लिखकर लाये एवं प्रमोद बाजपेयी को काम रोको आदेश की प्रति थमा दी। जिसमें सफेदा लगे स्थान पर किसी भी अधिकारी के लघु हस्ताक्षर नहीं थे। दस्तावेजों में हेराफेरी एवं कूटरचित दस्तावेजों के होने की शंका के कारण प्रमोद बाजपेयी द्वारा 3 अप्रैल को उक्त प्रकरण के समस्त दस्तावेजों की सत्यापित प्रति प्राप्त की गई जिससे जानकारी हुई कि दादू बिल्डर्स के अशोक अग्रवाल के नाम से पार्टनर के नाम से पार्टनर के रूप में उसके कर्मचारी द्वारा स्वयं उपस्थित होकर आवेदन प्रस्तुत किया गया कि शीशधर बाजपेयी द्वारा उनके आवासीय प्लाट का व्यक्तिगत रास्ता रोककर अतिक्रमण किया जा रहा है। जिस पर तहसीलदार द्वारा काम रोको आदेश जारी कर दिया गया। इसी क्रम में दादू बिल्डर्स के कर्मचारी द्वारा 1 अप्रैल को संशोधन आवेदन प्रस्तुत किया गया जिसमें शीशधर बाजपेयी के  नाम के स्थान पर प्रमोद बाजपेयी के नाम पर न्यायालय द्वारा काम रोको आदेश जारी करने का आवेदन लगाया गया किन्तु प्रशासनिक मिली भगत का प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि तहसीलदार के न्यायालय में संशोधन आवेदन 1 अप्रैल को पेश किया गया किन्तु तहसीलदार द्वारा आवेदन लगने के एक दिन पूर्व ही अर्थात 30 मार्च को अपना काम रोको आदेश जारी कर उसकी तामिली भी करवा  दी गई। रायगढ़ तहसीलदार के रूप में जब से श्री वैद्य ने पदभार संभाला है, ऐसे विसंगतिपूर्ण आदेशों की शिकायतें आम हो गई है। जिलाधीश ने यदि शीघ्र ऐसे प्रकरणों पर ध्यान न दिया तो रायगढ़ में एक बड़े जमीन घोटाले की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

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अस्पताल में पानी के लिए हाहाकार

रायगढ़। शहर में पड़ रही प्रचंड गर्मी के कारण जहां शहर के कई मोहल्लों में पानी की किल्लत हो गई है वहीं जिला चिकित्सालय के अधिकांश बोर खराब हो जाने के कारण यहां पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। जिला चिकित्सालय परिसर में कुल 6 बोर है जिनमें से मात्र दो बोर इस समय चल रहा है इनमें से एक नया बोर जो नये ओपीडी के पास जेएसपीएल द्वारा खुदवाया गया था उसका कनेक्शन नये ओपीडी से जुड़ा होने के कारण शेष वार्डों के लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है इसके अलावा आईसीयू के सामने स्थित बोर चल रहा है जबकि रेडक्रास के सामने, उद्यान के भीतर तथा रेडक्रास दवा दुकान के सामने सहित बाकि बोर बेकार पड़े है जिसके कारण मरीजों के परिजनों को दिन भर बोतल या बाल्टी लेकर पानी के लिए भटकना पड़ता है। आलम यह है कि निस्तारी के लिए पानी तो दूर यहां आने वाले लोग पीने के बुंद-बुंद पानी के लिए तरस रहे है। कुछ मरीजों के परिजनों ने बताया कि दो दिन पहले यहां निगम द्वारा 4 टेंकर पानी आया था इसके बावजूद पानी लोगों को पर्याप्त मात्रा में नहीं मिला। वहीं अब तो टैंकर से पानी भी नहीं आ रहा है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि परिसर में किस कदर पानी की किल्लत है। अस्पताल प्रबंधन से इस संबंध में चर्चा करने पर उनका स्पष्ट जवाब होता है कि जल आपूर्ति तथा बोर का रख-रखाव का जिला पीएचई को सौंपा गया है। वहीं पीएचई द्वारा इन बिगड़े हुए बोर पंपों को सुधारने के लिए कोई त्वरित कार्रवाई न करने से यह समस्या विकराल रूप धार करने लगी है। यदि समय रहते इस समस्या के निदान की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में अस्पताल परिसर के भीतर ही पानी के लिए किसी की जान भी जा सकती है इसलिए जिला प्रशासन तथा कलेक्टर रायगढ़ को अस्पताल की इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए त्वरित कार्रवाई के लिए निर्देशित करने की जरूरत है ताकि अस्पताल के विभिन्न वार्डों में भर्ती मरीज तथा उनके परिजनों को राहत मिल सके।

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गर्मी से उबल रहे मरीज

कवर्धा। स्थानीय जिला चिकित्सालय में मरीजों का हाल इस भीषण गर्मी में बंद से बदत्तर है आवश्यक सुविधाओं की कभी से जुझ रहे मरीजों को अपने बीमार स्वास्थ्य के साथ-साथ इस मौसम में भी दो चार होना पड़ रहा है। गर्मी शुरू होने के पहले अस्पताल प्रबंधन द्वारा बढ़ चढ़कर किये जाते है हम मरीजों को इस गर्मी में विशेष ख्याल रखेंगे उन्हें ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे लेकिन सारे दाने खोखले ही हुए क्योंकि मरीजों को मिलने वाली सुविधाएं अपर्याप्त है मरीजों के साथ परिजनों को भी खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
अप्रैल माह में बढ़ रही भीषण गर्मी से जहां लोग परेशान हो रहे है वहीं अस्पताल में भर्ती मरीज भी हलाकान हो रहे है। गर्म हवाओं के बीच मरीजों को राहत नहीं मिल पा रही है। पंखो व कूलरों की हवा भी बेअसर होने लगी है अस्पताल में कूलर लगभग 8 से 10 है तो बड़े कमरे में लगे हुए है तथा पंखा 35 40 तक है बावजूद इसके तमाम संसाधन मरीजों के लिए अपर्याप्त बने हुए है। अस्पताल में भर्ती मरीजों की बड़ी मुश्किल से शीतल जल उपलब्ध हो रहा है। गर्मी के मौसम में ठंडे पानी के लिए मरीजों एवं उनके परिजनों को इधर उधर भटकना पड़ रहा है। मरीजों को ठंडे पानी उपलब्ध कराने के लिए अस्पताल परिसर में चार पांच मटके रखे गए है लेकिन उसमें भी कभी पानी भरा रहता है तो कभी खाली रहता है। पानी देने वाले भी कोई नहीं रहते। अलग-अलग वार्डो में लगे कूलरों की भी स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है 8 से 10 कूलरों में से 5 -6 कूलर तो ऐसे है जिसमें ठंडी हवा तो नहीं गर्म हवा जरूर मिलती है। बाकी बचे कुलरों में समय सयम पर पानी डालने के लिए यहां कोई नही है। पानी खत्म हो जाने के बाद यही कूलर गर्म हवा के साथ आग उगलना शुरू कर देते है। वार्डो में लगे पंखे सिर्फ देखने भर की है इन पंखो की रफतार इतनी कम है कि इससमे मरीजों को थोड़ी बहूत भी राहत न मिल पा रही है कहले को तो सभी पंखे चालू हालत में है लेकिन हकीकत यही है कि इन पंखो व कुलरों से मरीजों को कुछ ज्यादा लाभ नहीं मिल रहा है। प्रसुति वार्ड में जच्चा बच्चा के लिए इस गर्मी में खास ध्यान देने की जरूरत है लेकिन अस्पताल प्रबंधन द्वारा किए गए उपाए नकामी है महिला वार्ड की स्थिति भी ज्यादा अच्छी नही है। पूरे 24 घंटे मरीजों को अपनी बिमारी के साथ-साथ गर्मी में जूझते असानी से देखा जा सकता है।

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महिला वेशभूषा में संदिग्ध युवक गिरफ्तार

कांकेर।  महिला का वेशधारण कर नगर के एक मोहल्ले में चोरी की नियत से रात 2.30 बजे घुम रहे कोलकाता के श्यामली बोस(36)को पुलिस के गश्ती दल ने नागरिकों के सहयोग से दबोच लिया। मिली जानकारी के अनुसार यह व्यक्ति 2.30 बजे एकता नगर में अकेले घुमते चोरी करने महिला वेश में टोह ले रहा था। गश्ती दल को देख वह भागने लगा तब वार्ड के लोगों के सहयोग से उसे दबोच लिया।

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बच्चे भी लोगों की प्यास बुझा रहे

धमतरी। इतवारी बाजार स्थित माँ तुलजा भवानी मंदिर के सामने भीषड़ गर्मी में राहगिरों के लिए शीतल पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है। इस प्याऊ में आसपास के काफी लोगों को काफी राहत मिल रही है वहीं लोगों को पानी देकर प्यास बुझाने में छोटे-छोटे बच्चें खूब रूचि ले रहे है। आज सुबह इन बच्चों के हौसला अफजाई के लिए भाजपा जिलाध्यक्ष महेन्द्र पंडित प्याऊ घर पहुंच कर उन्हें स्नेह देते हुए अच्छे कार्य करने की बधाई दी।

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सोमवार, 26 अप्रैल 2010

खबरें इधर-उधर की

सरकारी एम्बुलेंस में बारात
कांकेर। सरकारी एम्बुलेंस में बाराती ले जाने का मामला प्रकाश में आया है। जिसकी शिकायत करने चारामा वाहन चालक संघ आज स्वास्थ्य अधिकारी को किये जाने के बाद कांकेर में शिकायत दर्ज कराई।
वाहन चालक संघ के सदस्यों ने अपनी शिकायत में बताया कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र चारामा की नई सुमो(एम्बुलेन्स)के चालक लक्ष्मण सलाम ने 24 अप्रेल को ग्राम रतेसरा से बारातियो को कोडेगांव जिला धमतरी ले जाया गया है। जिस पर वाहन चालक संघ के अध्यक्ष शंकरपुरी गोस्वामी ने आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि एम्बुलेंस वाहन यदि बाराती ढोते रहेंगे तो बीमार मरीजों का क्या होगा? साथ ही बाकी हम गरीब वाहन चालकों का क्या होगा? बारात ले जाते समय जानकारी मिलने पर वाहन चालक संघ द्वारा चालक लक्ष्मण को मना करने पर उसके द्वारा अपशब्द कहा गया तथा जहां शिकायत करना है कर लो कह कर धमकी देते हुउए एम्बुलेंस में बाराती बिठाकर रवाना हो गया। वाहन चालक संघ ने चालक लक्ष्मण सलाम पर उचित कार्यवाही किए जाने की मांग स्वास्थ्य विभाग से की है।

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क्रिकेट बैट से पीट-पीटकर पत्नी की हत्या

रायगढ़। शराब के नशे में पत्नी से विवाद होने पर एक व्यक्ति ने क्रिकेट बैट से पीट-पीटकर उसे मौत के घाट उतार डाला। घटना  सुबह मिट्ठुमुड़ा सारथी मोहल्ले में घटित हुई। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है।
जानकारी के अनुसार जूट मिल चौकी अंतर्गत मिट्ठुमुड़ा सारथी मोहल्ला निवासी मंगल सारथी उम्र 32 वर्ष का  सुबह करीब 11 बजे अपनी पत्नी गीता बाई से विवाद हो गया। बताया जाता है कि मंगल आदतन शराबी है और जो कुछ कमाता है पीने में उड़ा देता है जिसके कारण गीता बाई गली-मोहल्ले घुम-घुमकर कबाड़ का सामान इकट्ठा कर उसे बेचकर अपने चार बच्चों सहित परिवार का भरण पोषण करती थी। पिछले दिनों मंगल सारथी की बहन के घर में मेहमान आने पर गीता बाई और मंगल में कमाकर लाने को लेकर विवाद हुआ था। इसी क्रम में  सुबह जब मंगल शराब पीकर घर लौटा तो गीता बाई अपने पति को खरी-खोटी सुनाने लगी जिस बात को लेकर पति-पत्नी में विवाद शुरू हो गया और विवाद बढऩे पर आक्रोशित होकर मंगल घर में रखे क्रिकेट बैट से गीता के सिर पर ताबड़तोड़ प्राणघातक हमला कर दिया जिससे मौके पर ही गीता बाई की मौत हो गई। घटना की जानकारी मिलने पर तत्काल पुलिस मौके पर पहुंची और मर्ग पंचनामा कार्रवाई पश्चात शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाते हुए भादवि की धारा 302 के तहत आरोपी पति को गिरफ्तार कर लिया है।

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घायल को भी नहीं बख्शा

रायपुर। शहर के हृदय स्थल जयस्तंभ चौक में घायल अवस्था में पड़े एक व्यक्ति के जेब से किसी ने 6 हजार रुपए नगद सहित मोबाइल फोन पार कर दिया।
पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कोटा निवासी अब्दुल रहीम का पुत्र अब्दुल शकील 30 वर्ष टिफिन सेंटर चलाता है। रोज की तरह वह कल रात भी अपनी मोटर साइकिल से रात करीब 10 बजे टिफिन बांटने निकला था। लेकिन रात भर वह घर नहीं लौटा। सुबह परिजनों को खबर मिली कि अब्दुल शकील सड़क हादसे में घायल होकर अम्बेडकर अस्पताल में भर्ती है। घबराए परिजन जब अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि गोलबाजार की पेट्रोलिंग पार्टी ने उसे जयस्तंभ चौक में घायल अवस्था में पड़े देखा और अस्पताल में भर्ती कराया। परिजनों ने बताया कि शकील के सिर व पिछले हिस्से में चोट के निशान हैं जिससे लगता है कि किसी ने उस पर हमला किया है। परिजनों ने यह भी आरोप लगाया है कि शकील जब घर से निकला था तो उसकी जेब में 6 हजार रुपए नगद सहित मोबाइल फोन भी था, जो उसकी जेब से गायब हो चुका है। समाचार लिखे जाने तक घायल शकील को होश नहीं आया था, इधर पुलिस ने उसके होश में आने के बाद बयान दर्ज करने की बात कही है।

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नहीं बदली तांगेवालों की जिंदगी

दुर्ग। निरंतर बदलते समय के साथ शहर की प्रगति के भी कई पन्ने बदल गए। किंतु दुर्ग शहर के आधा सैकड़ा के आसपास टांगेवालों का जीवन आज भी उसी ढर्रे पर चल रहा है। बदलाव के नाम पर पारंपरिक पेशे से विमुख होती नई पीढ़ी, सतत सिमटता जा रहा कमाई का जरिया और तांगे गाड़ी के लकड़ी के पहिये की जगह मोटर गाडिय़ों के पहियों का इस्तेमाल को ही इस कुनबे की उपलब्धि कहा जा सकता है। सुरसा की तरह बढ़ती महंगाई के इस युग में टांगे वाले किसी तरह अपने परिवार का पेंट पाल रहे हैँ। मोटर गाड़ी के  जमाने में तांगे वालों की जीविका बचाए रखने पिछले दिनों जिला कलेक्टर ठाकुर रामसिंह ने इंदिरा मार्केट की कुछ प्रमुख सड़कों को टांगेवालों के लिए सुरक्षित घोषित किया है।

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शनिवार, 24 अप्रैल 2010

शहरों की ओर नक्सली

- प्रभात अग्रवाल -
बस्तर में बल के बढ़ते दबाव के चलते नक्सली शहरों की ओर पलायन करने लगे हैं। इस तरह की मिल रही गोपनीय सूचनाओं के बाद नक्सल प्रभावित जिलों के आसपास के इलाकों को सतर्क कर दिया गया है। सीमाओं पर चौकसी बरतने को भी कहा गया है। बस्तर के ताड़मेटला घटनाक्रम के बाद एक ओर जहां देशभर में लोगों ने गम्भीर प्रतिक्रिया जताई है तो दूसरी ओर राज्य और केन्द्र सरकार भी अब और ज्यादा सख्ती के मूड़ में है। हालातों को भांपकर नक्सलियों ने भी पैतरा बदल दिया है और अब वे शहरों की ओर रूख कर रहे हैं।
नक्सलियों द्वारा बस्तर में 76 जवानों की नृशंस हत्या के बाद सीआरपीएफ के जवान बीहड़ों में जाने से परहेज कर रहे हैं। हाल ही में यह खबर भी आई थी कि इन जवानों को खाने और साफ पानी की किल्लत से जूझना पड़ रहा है। मौसम की मार और मच्छरों की वजह से जवान पहले ही परेशान रहे हैं, वहीं नक्सलियों के हमलों की आशंका भी बराबर बनी रहती है। इस तरह की तमाम दिक्कतों के बाद अब केन्द्र और राज्य की सरकार मिलकर नए सिरे से योजनाएं बनाने और उसे मूर्त रूप देने में जुट गए हैं। लेकिन एक बात पूरी तरह से साफ हो गई है कि नक्सलियों के खिलाफ सेना और वायुसेना का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। दरअसल, इसके पीछे अपने कई कारण हैं। यदि सेना को बस्तर में तैनात किया जाता है तो पूरा बस्तर सैन्य शासन के दायरे में आ जाएगा और इस पूरे संभाग में सेना की मर्जी के बिना कोई काम नहीं हो पाएगा। इससे बस्तर के विकास और वहां के जनजीवन पर भी असर पडऩे की संभावना है, वहीं सेना के कोप का शिकार उन आदिवासियों को होना पड़ेगा, जो नक्सलियों के भय की वजह से जाने-अनजाने उन्हें प्रश्रय या किसी न किसी तरह का सहयोग करते रहे हैं। इसलिए अब नए सिरे से नई रणनीति के तहत फूंक-फूंककर कदम धरने की जरूरत है।
इधर, ताड़मेटला घटना के बाद जवानों की हौसला अफजाई के लिए डीजीपी विश्वरंजन ने पत्र लिखा है। अपने पत्र में उन्होंने ताड़मेटला घटना से सबक लेने और भविष्य में सर्चिंग अभियान के दौरान सावधानी बरतने की बात कही है। एक ओर जहां केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् तीन साल के भीतर नक्सलियों के खात्मे की बात कह रहे हैं तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह दो साल में छत्तीसगढ़ को नक्सलियों से मुक्त करने का दावा कर रहे हैं। इस तरह की बातों और दावों का जवाब नक्सली अपने प्रचलित तरीके से ही दे रहे हैं। ताड़मेटला घटना की जांच करने पहुंचे केन्द्रीय दल पर नक्सलियों ने गोलियां बरसाईं तो बस्तर के डिलमिली में जिस तरह उन्होंने रेल पटरियां उखाड़कर मालगाड़ी के 13 डिब्बे उतार दिए, उससे रेल यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ और करोड़ों रूपयों का नुकसान भी हुआ। वास्तव में, जब-जब नक्सलियों के खात्मे जैसे बयान आते हैं, वामपंथी उग्रवादी कोई न कोई बड़ी घटना को अंजाम देते हैं। इसलिए राजनेताओं को किसी तरह का बयान देने से पूर्व सावधानी बरतना भी जरूरी है। मालगाड़ी की पटरियां उतारकर नक्सलियों ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि उनकी गतिविधियों पर विराम नहीं लगा है। ....और इन सबके बाद अब नक्सलियों के शहरी क्षेत्रों में कूच करने की खबरें भयभीत करने वाली हैं। कुछ अरसा पहले राजधानी रायपुर और भिलाई क्षेत्र से कई बड़े नक्सली समर्थकों को असलहे के साथ गिरफ्तार किया गया। तब पहली बार यह पता चला कि नक्सली सिर्फ बीहड़ों ही नहीं, शहरों में भी काम कर रहे हैं।
फिलहाल बस्तर के लिए एक नई खबर सामने आई है कि वहां जनगणना का कार्य नहीं हो पाएगा। नक्सली आतंक के चलते यह संभव भी नहीं दिख रहा है। इसलिए प्रशासन ने वहां जनगणना के लिए कोई नया उपाय सुझाने संबंधी पत्र लिखा है। लेकिन बस्तर जैसे जटिल और विस्तृत क्षेत्र में कोई नया उपाय काम करेगा, इस बात की संभावना कम ही है। दरअसल, नक्सलियों के भय से मतगणना कर्मी गांवों में जाना नहीं चाहते। नतीजतन बस्तर के सभी 4 जिलों में यहब कार्य पहले से ही ठंड़ा पड़ा हुआ है। इधर, कांग्रेस ने सुरक्षा बलों में पारस्परिक तालमेल के लिए राजभवन में नोडल अफसर की नियुक्ति का सुझाव दिया है। राज्यपाल से चर्चा करने पहुंचे कांग्रेसियों का कहना था कि प्रत्येक नक्सली वारदात के बाद सरकार रणनीतिक चूक का रटा-रटाया जवाब देती है और नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब देने की बात कही जाती है, लेकिन आज तक ऐसा हो नहीं पाया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष धनेन्द साहू ने कहा कि बस्तर में जनजीवन सामान्य नहीं है। आदिवासियों की खेती-बाड़ी चौपट हो गई है। हाट-बाजार बंद पड़े हैं। आदिवासी वनोपज नहीं बेच पा रहे हैं। रोजगार गारंटी योजना समेत तमाम सरकारी कामकाज बंद पड़े हैं। नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे का कहना था कि नक्सल समस्या पर प्राथमिकता के आधार पर ध्यान देने की जरूरत है।
                                             नोट : लेखक राष्ट्रीय साप्ताहिक विदर्भ चंडिका के छत्तीसगढ़ ब्यूरो प्रमुख हैं।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

शह से पहले मिली मात

बैस का खेला पिछड़ा वर्ग कार्ड, भुनाया रमन ने

- नरेश सोनी -

छत्तीसगढ़ में निगम, मंडल और आयोगों में नियुक्तियों का सिलसिला जल्द ही शुरू होने जा रहा है। इसके लिए कई नाम तय कर लिए गए हैं जबकि कई अन्य नामों पर अंतिम मुहर अभी लगनी है। राज्य में आदिवासी समाज की लॉबिंग के बाद जिस तरह से सांसद रमेश बैस ने पिछड़ा वर्ग की वकालत करते हुए प्रदेश भाजपाध्यक्ष पद के लिए दावा ठोका, उसके दो दिनों बाद ही पिछड़ा वर्ग के एक विधायक का नाम मंत्री पद के लिए तय कर लिया गया। रमन सरकार के तेरहवें मंत्री दुर्ग जिले के नवागढ़ से विधायक दयालदास बघेल होंगे। दरअसल, बघेल के जरिए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने न केवल पिछड़ा वर्ग को साधने की कोशिश की है, बल्कि बैस की लगाई आग पर भी काबू पाने की चेष्टा की है।
उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ को आदिवासी राज्य बताए जाने पर सांसद रमेश बैस ने ऐतराज किया था। उनका कहना था कि पिछड़ा वर्ग की राज्य में तादाद 52 फीसदी है जबकि आदिवासी महज 12 फीसदी ही हैं। ऐसे में यह राज्य आदिवासी कैसे हो गया? शायद इसीलिए बैस ने भाजपा कोरग्रुप की हुई बैठक में प्रदेश अध्यक्ष के लिए अपना दावा ठोंक दिया। बैस, छत्तीसगढ़ भाजपा के अध्यक्ष बन पाते हैं, या नहीं यह दीगर बात है - पर बैस के के शह देने और खुद ही मात खाने के मसले पर काफी कुछ कहा जा सकता है। एक तीर से कई शिकार करने में माहिर सांसद रमेश बैस की निगाहें लम्बे समय से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रही है, लेकिन यह उनका दुर्भाग्य है कि वे कुछ कर नहीं पाए। कई बार लॉबिंग की खबरें भी आई पर कोई नतीजा नहीं निकल पाया। मजेदार बात यह है कि कोरग्रुप की बैठक होते तक किसी को मालूम भी नहीं था कि बैस ऐसा कोई दावा भी कर सकते हैं। उनके दावों ने दरअसल, कोरग्रुप के सदस्यों  को चकित कर दिया। इस बैठक से पहले तक आदिवासी नेता व सांसद मुरालीलाल सिंह की दावेदारी को पक्का माना जा रहा था और इसी कोरग्रुप की बैठक में उनके नाम पर अंतिम मुहर भी लगनी थी। किन्तु ऐन वक्त पर रमेश बैस द्वारा स्वयं को अध्यक्ष पद के लिए प्रोजेक्ट किए जाने और पिछड़ा वर्ग की वकालत करने से छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बार फिर उठापटक के संकेत मिलने लगे। गौरतलब है कि राज्य के आदिवासी नेता समय-समय पर लामबंद होकर सत्ता के शीर्ष पदों पर दावेदारी करते रहे हैं। राजधानी रायपुर में कुछ समय पूर्व राज्यभर के आदिवासियों ने रैली निकालकर ताकत दिखाई थी। इस रैली में सभी दलों के आदिवासी नेता शामिल हुए और मुख्यमंत्री और राज्यपाल जैसे पदों पर दावा जताया गया था। एक बार फिर देशभर के आदिवासी लामबंद होने जा रहे हैं। यह पिछड़ों के लिए खतरे की घंटी भी है क्योंकि इस वर्ग के साथ सत्ता और संगठन में कभी न्याय नहीं हुआ। इसलिए इस वर्ग के नाम पर ही सही, बैस ने अपना कार्ड तो खेल दिया। पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं। बैस के इरादों को भांपकर उन्होंने करीब सवा सालों से खाली पड़े तेरहवें मंत्री के पद के लिए दयालदास बघेल के  नाम पर मुहर लगा दी। इससे पहले कि पिछड़ा वर्ग की कोई नई मुहिम शुरू हो पाती, राजनीति के माहिर खिलाड़ी की तरह मुख्यमंत्री डॉ. सिंह ने पिछड़ा वर्ग और वह भी बैस की ही बिरादरी के नेता को आगे बढ़ाकर खुद को मिलने वाली शह से पहले ही सामने वाले को मात दे दी।
राज्य में भाजपा को बहुमत मिलने के बाद जिन लोगों के नाम मुख्यमंत्री पद के लिए प्रमुखता से लिए जा रहे थे, उनमें एक रमेश बैस भी थे। लेकिन क्योंकि डॉ. रमन सिंह ने केन्द्रीय मंत्री का पद छोड़कर प्रदेश भाजपाध्यक्ष की कमान संभाली थी, इसलिए पार्टी की नजरों में रमन सिंह का वजन ज्यादा था। इससे पहले अजीत जोगी ने आदिवासी कार्ड खेला था और इसी कार्ड के दम पर वे मुख्यमंत्री बने। स्वयं को आदिवासी बताने और आदिवासी वर्ग के प्रति उनके लगाव ने इस वर्ग को छत्तीसगढ़ में काफी सशक्त बना दिया। नतीजतन डॉ. रमन सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद आदिवासी वर्ग को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया, ताकि पूरा आदिवासी समुदाय कांग्रेस की बपौती बनकर न रह जाए। संगठन की कमान एक आदिवासी को सौंपी गई तो मंत्रिमंडल में भी आदिवासी विधायकों को पर्याप्त जगह मिली। इसके चलते राज्य के पिछड़ा वर्ग के नेता हाशिए पर चले गए। राज्य में आदिवासी वर्ग इसलिए भी सुर्खियों में रहा क्योंकि बस्तर में नक्सलियों की आमद का खामियाजा इन्हीं आदिवासियों ने भोगा। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। भाजपा को राज्य में दोनों बार सत्ता में लाने में आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों की बड़ी भूमिका रही है। यह बात अलग है कि छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के इकलौते सांसद चरणदास महंत ने लोकसभा में नक्सलियों से सांठगांठ के मसले पर भाजपा की खूब भद्द पीटी।
पर बैस की मंशा कुछ और ही दिखाई पड़ती है। कहीं न कहीं वे संगठन के जरिए छत्तीसगढ़ की सत्ता के केन्द्र तक पहुंचने की राह तलाश रहे हैं। हालांकि अभी विधानसभा चुनाव को करीब काफी वक्त है पर यदि वे प्रदेश अध्यक्ष बन जाते हैं तो संगठन की ताकत के बल पर आसान राह भी बना सकते हैं। दिल्ली में बैठे कई वरिष्ठ नेता उनका साथ दे रहे हैं। जाहिर है कि वे पिछड़ों के सर्वमान्य नेता बनने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनकी इन कोशिशों को रमन ने पलीता लगा दिया है। पिछड़ा वर्ग को प्रतिनिधित्व देकर उन्होंने इस पूरे समाज को तो साधने की कोशिश की ही है, साथ ही बैस को भी एक तरह से ठिकाने लगा दिया है।
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