दोस्तों, पूरे यकीन के साथ कह रहा हूं कि ब्लागर साथियों के साथ काफी कुछ गलत हो रहा है। यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि टॉप लिस्ट में शामिल होने के लिए कई लोग किस तरह की लामबंदी और गिरोहबंदी कर रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से मेरे साथ जो हो रहा है, वह सबके साथ बांटना चाहता हूं। अभी शनिवार की बात है। मैंने एक ब्लाग को पसंद किया तो वह -2 (माइनस 2) हो गया। यानि यह बताया गया कि इस ब्लाग को दो लोगों ने नापसंद किया है। जबकि इससे पहले पसंद या नापसंद शून्य बता रहा था।) पसंद के बाद माइनस में जाना मुझे समझ में नहीं आया। कल भी मैंने एक ब्लागर का चिट्ठा जब पसंद किया (जिसे पहले से ही 3 लोगों ने पसंद किया था) तो भी मेरी पसंद नकारात्मक गई। जबकि मैं यह बेहतर जानता हूं कि चिट्ठे को पसंद कैसे किया जाता है और नापसंद कैसे? मंगलवार शाम को जब मैंने एक घटिया किस्म के ब्लाग को नापसंद किया तो आश्चर्यजनक रूप से दो अंक प्लस में चला गया। ब्लाग जगत के दिग्गजों से मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या ऐसा भी हो सकता है? कृपया मुझे बताएं कि पसंद करने वाले नापसंद और नापसंद करने वाले पसंद कैसे बन रहे हैं।
एक बात और बताना चाहूंगा। एक महिला के जब मैंने टिप्पणी भेजी तो संदेश आया कि आप इस ब्लाग पर संदेश नहीं भेज सकते। जबकि मैंने उस महिला की पंक्तियों को सराहा था। क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ लोग अपने ब्लाग में ऐसे ईमेल डालकर रखें, जिनकी टिप्पणी प्रकाशित ही न हो पाए? इससे पहले एक सज्जन के साथ भी मेरा यही अनुभव रहा है और मजे की बात यह है कि यह दोनों एक दूसरे के साथ हैं। इसे क्या माना जाए?
मंगलवार, 11 मई 2010
सोमवार, 10 मई 2010
चेंदरू के बेटे को शिक्षक बना दो
(नरेश सोनी)
क्या आप चेंदरू को जानते हैं? सवाल अजीब लग सकता है - कौन चेंदरू? 1960 के दशक में एक 10 साल का माडिय़ा आदिवासी अंतरराष्ट्रीय नायक बनकर उभरा था। चेंदरू पर स्वीडिश फिल्मकार अर्ने सुकेड्राफ की पत्नी एस्ट्राइड सुकेड्राफ ने एक किताब लिखी थी। इस किताब का विलियन सैमसंग ने अंग्रेजी अनुवाद किया। बाद में अर्ने ने 10 साल के चेंदरू के जीवन का पूरे 2 साल तक फिल्मांकन किया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चेंदरू और उसका शेर नामक यह फिल्म बेहद कामयाब रही। जिसके बाद किसी अबूझमाडिय़ा को पहली बार विदेश जाने का भी अवसर मिला। बाद में फ्रांस में भी चेंदरू एट सन टाइगर नाम की पुस्तक छपी। अमेरिका में भी इसी दौरान चेंदरू : द ब्वाय एंड द टाइगर के नाम से किताब प्रकाशित हुई। अभी कुछ समय पहले ही चेंदरू और उसके जीवन पर एक समाचार चैनल ने घंटेभर का विशेष कार्यक्रम भी प्रसारित किया था और उसकी वर्तमान बुरी हालत की परतें खोली थी। अबूझमाड़ के इसी चेंदरू का बेटा शिक्षक बनना चाहता है।
चेंदरू की कहानी विदेशों में शायद इसीलिए पहचान बना पाई कि एक 10 साल के लड़के का दोस्त एक व्यस्क शेर था। चेंदरू सारा दिन इसी शेर के साथ जंगलों में घूमता, शिकार करता। शायद विदेशों में इस कहानी की लोकप्रियता टारजन जैसी फिल्मों की वजह से हुई। टारजन को काल्पनिक पात्र माना जाता है, लेकिन भारत के बेहद पिछड़े परिवेश में एक वास्तविक टारजन का हीरो बन जाना वाकई चकित करने वाला है। चेंदरू तो अनपढ़ था, किन्तु उसने अपने बच्चों को पढ़ाया। उसका बेटा जयराम शिक्षाकर्मी बनना चाहता है। वह बस्तर जैसे पिछड़े इलाके खासकर अबूझमाड़ में शिक्षा की अलख जगाने का इच्छुक है। वैसे, एक नंगी सच्चाई यह भी है कि नारायणपुर जिले के गड़बेंगाल में रहने वाले चेंदरू का परिवार दो जून की रोटी का भी मोहताज है। समाचार चैनल में चेंदरू की लम्बी स्टोरी चलने के बाद बस्तर के प्रभारी मंत्री केदार कश्यप ने चेंदरू को 25 हजार रूपए का अनुदान दिया था। लेकिन उसके बाद से कभी, किसी ने इस परिवार की सुध नहीं ली। जबकि नारायणपुर जिले का अबूझमाड़ ही वह क्षेत्र है, जो सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित है। सरकार ने इस क्षेत्र के शिक्षिक बेरोजगारों को सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया था, लेकिन यह ऐलान जमीन पर आकर कब का दम तोड़ चुका है। एक ओर जहां बस्तर के भीतरी इलाकों में जाकर कोई काम करना नहीं चाहता तो दूसरी ओर इच्चुक स्थानीय लोग ही उपेक्षित हैं। इस विडंबना से पार पाना बड़ी चुनौती है।
क्या आप चेंदरू को जानते हैं? सवाल अजीब लग सकता है - कौन चेंदरू? 1960 के दशक में एक 10 साल का माडिय़ा आदिवासी अंतरराष्ट्रीय नायक बनकर उभरा था। चेंदरू पर स्वीडिश फिल्मकार अर्ने सुकेड्राफ की पत्नी एस्ट्राइड सुकेड्राफ ने एक किताब लिखी थी। इस किताब का विलियन सैमसंग ने अंग्रेजी अनुवाद किया। बाद में अर्ने ने 10 साल के चेंदरू के जीवन का पूरे 2 साल तक फिल्मांकन किया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चेंदरू और उसका शेर नामक यह फिल्म बेहद कामयाब रही। जिसके बाद किसी अबूझमाडिय़ा को पहली बार विदेश जाने का भी अवसर मिला। बाद में फ्रांस में भी चेंदरू एट सन टाइगर नाम की पुस्तक छपी। अमेरिका में भी इसी दौरान चेंदरू : द ब्वाय एंड द टाइगर के नाम से किताब प्रकाशित हुई। अभी कुछ समय पहले ही चेंदरू और उसके जीवन पर एक समाचार चैनल ने घंटेभर का विशेष कार्यक्रम भी प्रसारित किया था और उसकी वर्तमान बुरी हालत की परतें खोली थी। अबूझमाड़ के इसी चेंदरू का बेटा शिक्षक बनना चाहता है।
चेंदरू की कहानी विदेशों में शायद इसीलिए पहचान बना पाई कि एक 10 साल के लड़के का दोस्त एक व्यस्क शेर था। चेंदरू सारा दिन इसी शेर के साथ जंगलों में घूमता, शिकार करता। शायद विदेशों में इस कहानी की लोकप्रियता टारजन जैसी फिल्मों की वजह से हुई। टारजन को काल्पनिक पात्र माना जाता है, लेकिन भारत के बेहद पिछड़े परिवेश में एक वास्तविक टारजन का हीरो बन जाना वाकई चकित करने वाला है। चेंदरू तो अनपढ़ था, किन्तु उसने अपने बच्चों को पढ़ाया। उसका बेटा जयराम शिक्षाकर्मी बनना चाहता है। वह बस्तर जैसे पिछड़े इलाके खासकर अबूझमाड़ में शिक्षा की अलख जगाने का इच्छुक है। वैसे, एक नंगी सच्चाई यह भी है कि नारायणपुर जिले के गड़बेंगाल में रहने वाले चेंदरू का परिवार दो जून की रोटी का भी मोहताज है। समाचार चैनल में चेंदरू की लम्बी स्टोरी चलने के बाद बस्तर के प्रभारी मंत्री केदार कश्यप ने चेंदरू को 25 हजार रूपए का अनुदान दिया था। लेकिन उसके बाद से कभी, किसी ने इस परिवार की सुध नहीं ली। जबकि नारायणपुर जिले का अबूझमाड़ ही वह क्षेत्र है, जो सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित है। सरकार ने इस क्षेत्र के शिक्षिक बेरोजगारों को सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया था, लेकिन यह ऐलान जमीन पर आकर कब का दम तोड़ चुका है। एक ओर जहां बस्तर के भीतरी इलाकों में जाकर कोई काम करना नहीं चाहता तो दूसरी ओर इच्चुक स्थानीय लोग ही उपेक्षित हैं। इस विडंबना से पार पाना बड़ी चुनौती है।
शुक्रवार, 7 मई 2010
अटका-मटका, मारो-फटका
अपन ने अपने ब्लाग का वर्ग बदल लिया है। क्या करें, मजबूरी थी। भाई-दीदी लोग टिप्पणी करने में भी कंजूसी कर रहे थे। कंजूसी क्या कर रहे थे, समाचारों को पसंद नहीं कर पा रहे थे। अब जब पसंद ही नहीं आएगा तो टिप्पणी क्या खाक करेंगे? ...तो इसलिए फुल एंड फाइनल अब छत्तीसगढ़ खबर में
मौज और मस्ती
चायपत्ती सस्ती
पुराने विचार नस्ती।
पिछले तीन महीनों से लगातार ब्लाग पढऩे और शीर्ष पर चढऩे वाले ब्लागों को देखने के बाद यह नतीजा निकला है कि अब मैं भी
अटका-मटका
मारो-फटका
झूमो-झटका
उठाओ-पटका
आओ-खाओ
पिओ-सुस्ताओ
सोओ-मस्ताओ...
..टाइप का कुछ लिखने की कोशिश करूंगा। क्षमा कीजिएगा, पर कोशिश करूंगा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आज से पहले कभी इस तरह की चीजें लिखी नहीं है। जानता हूं कि इसके बाद भी कोई गारंटी नहीं है पसंद ही किए जाएं, पर रिस्क लेने में खर्च क्या होना है? तो मित्रों, आज से अपन भी नए सिरे से मैदान में उतर रहे हैं। स्वागत नहीं करेंगे क्या?
मौज और मस्ती
चायपत्ती सस्ती
पुराने विचार नस्ती।
पिछले तीन महीनों से लगातार ब्लाग पढऩे और शीर्ष पर चढऩे वाले ब्लागों को देखने के बाद यह नतीजा निकला है कि अब मैं भी
अटका-मटका
मारो-फटका
झूमो-झटका
उठाओ-पटका
आओ-खाओ
पिओ-सुस्ताओ
सोओ-मस्ताओ...
..टाइप का कुछ लिखने की कोशिश करूंगा। क्षमा कीजिएगा, पर कोशिश करूंगा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आज से पहले कभी इस तरह की चीजें लिखी नहीं है। जानता हूं कि इसके बाद भी कोई गारंटी नहीं है पसंद ही किए जाएं, पर रिस्क लेने में खर्च क्या होना है? तो मित्रों, आज से अपन भी नए सिरे से मैदान में उतर रहे हैं। स्वागत नहीं करेंगे क्या?
मंगलवार, 4 मई 2010
जहर चाटने के बाद छटपटाते रमन
- नरेश सोनी -
सामान्य बुद्धि का कोई भी व्यक्ति यह बेहतर जानता है कि जहर का सेवन कितना घातक होता है। शायद इसीलिए कांग्रेस इस जहर को चाटने से बचती रही है। उसे यह भलीभांति मालूम था और है कि इससे मौत भी हो सकती है। लेकिन छत्तीसगढ़ की नब्ज पर हाथ धरे बैठे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को शायद यह मालूम नहीं था कि 'यह गरल कितनी छटपटाहट देगा? नतीजतन उन्होंने यह गरल धारण कर लिया और अब जाहिर है कि परेशान हो रहे हैं।
मामला सिंह बनाम सिंह का है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के एक लेख का सार यह निकला कि वे अपनी ही केन्द्र सरकार के गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की नक्सल नीतियों से सहमत नहीं है। मसला क्योंकि छत्तीसगढ़ से भी जुड़ा था, इसलिए यहां के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का लाल-पीला होना लाजिमी था। तो बात यहां तक पहुंची कि डॉ. सिंह ने भी अखबारों में अपना लम्बा-चौड़ा लेख छपवा लिया। इस लम्बे-चौड़े लेख की भाषा से दिग्विजय सिंह ने असहमति जाहिर की और डॉ. रमन सिंह को एक पत्र लिख मारा। बस, छत्तीसगढ़ में अभी यही सब कुछ चल रहा है। दिग्विजय सिंह खुली चर्चा की चुनौती दे रहे हैं और डॉ. रमन सिंह उसे स्वीकार कर रहे हैं। दरअसल, डॉ. रमन सिंह 6 वर्षों से छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद के खात्मे के लिए प्रयासरत् रहे हैं। इसके लिए उन्हें लम्बी जुगत भी लगानी पड़ी। सबसे बड़ी समस्या जनमत तैयार करने की थी। इससे भी बड़ी समस्या केन्द्रीय मदद लेना थी। लेकिन केन्द्र सरकार नक्सलवाद को बड़ी समस्या मानने से ही हिचकती रही। तो सबसे पहले तो नक्सलवाद को सबसे बड़ी चुनौती साबित करना ही समस्या थी। इसमें कामयाबी मिली तो केन्द्र से मदद के दरवाजे खुल गए और नक्सलियों के खात्मे की तैयारियां भी शुरू हो गई। ऐसे में नक्सलियों का बौखलाना लाजिमी था। नतीजतन सलवा जुड़ूम से जुड़े लोगों, जवानों का कत्लेआम शुरू हो गया।
क्या कोई भी लड़ाई बिना कुर्बानी के नतीजे तक पहुंच सकती है? कांग्रेस ने लड़ाई लडऩे का कभी मन ही नहीं बनाया। वह कुर्बानियों से डरती रही। नतीजतन नक्सली फलते-फूलते और अपने को मजबूत करते रहे।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद ने गहरी जड़ें काफी पहले ही जमा ली थी। लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश की तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार हो या विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी, दोनों ने ही इन जड़ों को काटने के बजाए इससे परहेज करना ज्यादा मुनासिब समझा। यही वजह रही कि कांग्रेस के इस 10 वर्षीय (7 साल दिग्विजय सिंह, 3 साल अजीत जोगी) कार्यकाल में नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती रही और अपने आपको मजबूत करती रही। इस दौरान क्योंकि बस्तर के भीतरी इलाकों तक सरकार की पहुंच नहीं बन पाई (या फिर जानबूझकर इस इलाके को छुआ ही नहीं गया) इसलिए धीरे-धीरे पूरा बस्तर नक्सलियों की जद में आ गया। छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. रमन सिंह के सामने सिर्फ दो ही मसले थे। पहला राज्य का विकास और दूसरा नक्सलवाद से निपटने की चुनौती।
कई लोग यह सवाल उठाते रहे हैं कि जब राज्य में सब कुछ 'ठीक-ठाक चल रहा था तो नक्सलियों को 'उंगली क्यों की गई? पर यहां इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि नक्सलवाद कभी सामाजिक समस्या थी, पर बदलाव के साथ अब यह आपराधिक चुनौती बन चुकी है। किसी अपराधी का विरोध नहीं करने पर वह अपने को मजबूत करता चला जाता है और फिर कोई भी उससे बच नहीं पाता। नक्सलियों ने बस्तर के बीहड़ों से बाहर निकलकर शहरी क्षेत्रों में भी पैर पसारना शुरू कर दिया था। ऐसे में यदि डॉ. रमन सिंह की सरकार मुश्तैद नहीं होती तो नक्सली, शहरों में चुनौती देने की स्थिति में आ गए होते। राजधानी रायपुर भी नक्सलियों की आमद से अछूती नहीं रह गई थी। राजधानी के अलावा दुर्ग-भिलाई, राजनांदगांव, धमतरी जैसे इलाकों में नक्सलियों की धरपकड़ यह जाहिर करती है कि उनके मंसूबे क्या रहे होंगे। इसलिए कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से सहमति जाहिर करने से पहले यह भी विचार करना चाहिए कि नक्सलवाद जल्द ही शहरी क्षेत्रों के लिए भी चुनौती साबित होने जा रहा था। जिस बड़े पैमाने पर शहरों से असलहा बरामद हुआ और नक्सलियों के प्रवक्ता के भिलाई में रहने की सूचना मिली, उसका क्या मतलब था?
००००
सामान्य बुद्धि का कोई भी व्यक्ति यह बेहतर जानता है कि जहर का सेवन कितना घातक होता है। शायद इसीलिए कांग्रेस इस जहर को चाटने से बचती रही है। उसे यह भलीभांति मालूम था और है कि इससे मौत भी हो सकती है। लेकिन छत्तीसगढ़ की नब्ज पर हाथ धरे बैठे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को शायद यह मालूम नहीं था कि 'यह गरल कितनी छटपटाहट देगा? नतीजतन उन्होंने यह गरल धारण कर लिया और अब जाहिर है कि परेशान हो रहे हैं।
मामला सिंह बनाम सिंह का है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के एक लेख का सार यह निकला कि वे अपनी ही केन्द्र सरकार के गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की नक्सल नीतियों से सहमत नहीं है। मसला क्योंकि छत्तीसगढ़ से भी जुड़ा था, इसलिए यहां के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का लाल-पीला होना लाजिमी था। तो बात यहां तक पहुंची कि डॉ. सिंह ने भी अखबारों में अपना लम्बा-चौड़ा लेख छपवा लिया। इस लम्बे-चौड़े लेख की भाषा से दिग्विजय सिंह ने असहमति जाहिर की और डॉ. रमन सिंह को एक पत्र लिख मारा। बस, छत्तीसगढ़ में अभी यही सब कुछ चल रहा है। दिग्विजय सिंह खुली चर्चा की चुनौती दे रहे हैं और डॉ. रमन सिंह उसे स्वीकार कर रहे हैं। दरअसल, डॉ. रमन सिंह 6 वर्षों से छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद के खात्मे के लिए प्रयासरत् रहे हैं। इसके लिए उन्हें लम्बी जुगत भी लगानी पड़ी। सबसे बड़ी समस्या जनमत तैयार करने की थी। इससे भी बड़ी समस्या केन्द्रीय मदद लेना थी। लेकिन केन्द्र सरकार नक्सलवाद को बड़ी समस्या मानने से ही हिचकती रही। तो सबसे पहले तो नक्सलवाद को सबसे बड़ी चुनौती साबित करना ही समस्या थी। इसमें कामयाबी मिली तो केन्द्र से मदद के दरवाजे खुल गए और नक्सलियों के खात्मे की तैयारियां भी शुरू हो गई। ऐसे में नक्सलियों का बौखलाना लाजिमी था। नतीजतन सलवा जुड़ूम से जुड़े लोगों, जवानों का कत्लेआम शुरू हो गया।
क्या कोई भी लड़ाई बिना कुर्बानी के नतीजे तक पहुंच सकती है? कांग्रेस ने लड़ाई लडऩे का कभी मन ही नहीं बनाया। वह कुर्बानियों से डरती रही। नतीजतन नक्सली फलते-फूलते और अपने को मजबूत करते रहे।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद ने गहरी जड़ें काफी पहले ही जमा ली थी। लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश की तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार हो या विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी, दोनों ने ही इन जड़ों को काटने के बजाए इससे परहेज करना ज्यादा मुनासिब समझा। यही वजह रही कि कांग्रेस के इस 10 वर्षीय (7 साल दिग्विजय सिंह, 3 साल अजीत जोगी) कार्यकाल में नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती रही और अपने आपको मजबूत करती रही। इस दौरान क्योंकि बस्तर के भीतरी इलाकों तक सरकार की पहुंच नहीं बन पाई (या फिर जानबूझकर इस इलाके को छुआ ही नहीं गया) इसलिए धीरे-धीरे पूरा बस्तर नक्सलियों की जद में आ गया। छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. रमन सिंह के सामने सिर्फ दो ही मसले थे। पहला राज्य का विकास और दूसरा नक्सलवाद से निपटने की चुनौती।
कई लोग यह सवाल उठाते रहे हैं कि जब राज्य में सब कुछ 'ठीक-ठाक चल रहा था तो नक्सलियों को 'उंगली क्यों की गई? पर यहां इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि नक्सलवाद कभी सामाजिक समस्या थी, पर बदलाव के साथ अब यह आपराधिक चुनौती बन चुकी है। किसी अपराधी का विरोध नहीं करने पर वह अपने को मजबूत करता चला जाता है और फिर कोई भी उससे बच नहीं पाता। नक्सलियों ने बस्तर के बीहड़ों से बाहर निकलकर शहरी क्षेत्रों में भी पैर पसारना शुरू कर दिया था। ऐसे में यदि डॉ. रमन सिंह की सरकार मुश्तैद नहीं होती तो नक्सली, शहरों में चुनौती देने की स्थिति में आ गए होते। राजधानी रायपुर भी नक्सलियों की आमद से अछूती नहीं रह गई थी। राजधानी के अलावा दुर्ग-भिलाई, राजनांदगांव, धमतरी जैसे इलाकों में नक्सलियों की धरपकड़ यह जाहिर करती है कि उनके मंसूबे क्या रहे होंगे। इसलिए कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से सहमति जाहिर करने से पहले यह भी विचार करना चाहिए कि नक्सलवाद जल्द ही शहरी क्षेत्रों के लिए भी चुनौती साबित होने जा रहा था। जिस बड़े पैमाने पर शहरों से असलहा बरामद हुआ और नक्सलियों के प्रवक्ता के भिलाई में रहने की सूचना मिली, उसका क्या मतलब था?
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गुरुवार, 29 अप्रैल 2010
कौन मैली कर रहा है यह गंगा
एक बार फिर कुछ विघ्नसंतोषी गंगा को मैली करने पर तुल गए हैं। पता नहीं कौन-सा खेल है, पर इस खेल का नतीजा नहीं आना चाहिए, अन्यथा एक सुंदर और पवित्र मंशा को लेकर आगे बढ़ रहा ब्लाग सागर पूरी तरह से गंदा हो जाएगा।
पिछले कई दिनों से लगातार देख और पढ़ रहा हूं। ...और अब न चाहते हुए भी लिखना पड़ रहा है। साथियों, लम्बे प्रयासों के बाद मुझे हिन्दी में ब्लागिंग करने का अवसर मिला और तब सोचा था कि इस बहाने कई लोगों से सम्पर्क करने और अपनी बातों को बहुसंख्य तक पहुंचाने का अवसर मिल पाएगा। मुझे लगता है कि ऐसा औरों ने भी सोचा होगा। इस तरह एक जैसी पवित्र सोच लेकर हजारों लोग आगे बढ़ रहे हैं। पर लगता है कई खरगोशों को कछुओं की रफ्तार कुछ ज्यादा ही नजर आ रही है। उन्हें डर है कि यदि वे कहीं कमजोर पड़े तो कछुए एक बार फिर जीत हासिल कर लेंगे। पंचतंत्र की इस खरगोश और कछुए वाली कहानी से शायद ही कोई भारतीय अपरिचित होगा। पर इसी के साथ मैं अपने साथियों को एक बात और बताना चाहूंगा। एक कथित ब्लागर मित्र (कथित इसलिए कि उसकी गतिविधियों बिलकुल शून्य है, पर अपने सम्पर्कों तक लिंक पहुंचाने में वह चूक नहीं करता, भले ही उसके ब्लाग में सालभर पहले की पोस्ट पड़ी हुई हो।) ने कल ही मुझे बताया कि ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत में जाकर वह लेखों को बिना पढ़े ही टिप्पणी कर रहा है। ...और यह भी कि कई बड़े चिट्ठाकारों पर उसने नकारात्मक और बकवास किस्म की टिप्पणियां की है। (निवेदन है कि इस कथित ब्लागर का नाम न पूछें।) बहरहाल, मैंने इन सज्जन को अपनी और अन्य ब्लागर साथियों की भावनाओं से अवगत करा दिया है और उससे वायदा भी लिया है कि आइंदा वह इस तरह की हरकत नहीं करेगा।
साथियों, ब्लाग जगत में कई ऐसे लोग भी सक्रिय है, जिनका लिखने और पढऩे से कहीं कोई वास्ता नहीं है। ऐसे लोग महज मजा लेने के लिए आते हैं और मजा लेने के लिए उट-पटांग टिप्पणियां और नापसंदगी का चटखा लगा जाते हैं। मैं यह नहीं कहता कि सिर्फ ऐसे ही लोग ब्लाग-सागर को गंदा कर रहे हैं। संभव है कि सक्रिय किस्म के लोग भी ऐसा कर रहे हों, जैसा कि मैंने खरगोश और कछुए की कहानी के माध्यम से बताने का प्रयास किया है। इस बारे में ज्यादा कुछ इसलिए भी नहीं कहूंगा कि मुझे किसी पचड़े में नहीं पडऩा है। मैं एक शुद्ध और बेहतर सोच लेकर आगे बढऩा चाहता हूं। किसी की बुराई कर या व्यर्थ की बातें लिखकर अपने चिट्ठों में टिप्पणियों की संख्या बढ़ाने पर मेरा विश्वास नहीं है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, वे करते हैं।
पिछले कई दिनों से लगातार देख और पढ़ रहा हूं। ...और अब न चाहते हुए भी लिखना पड़ रहा है। साथियों, लम्बे प्रयासों के बाद मुझे हिन्दी में ब्लागिंग करने का अवसर मिला और तब सोचा था कि इस बहाने कई लोगों से सम्पर्क करने और अपनी बातों को बहुसंख्य तक पहुंचाने का अवसर मिल पाएगा। मुझे लगता है कि ऐसा औरों ने भी सोचा होगा। इस तरह एक जैसी पवित्र सोच लेकर हजारों लोग आगे बढ़ रहे हैं। पर लगता है कई खरगोशों को कछुओं की रफ्तार कुछ ज्यादा ही नजर आ रही है। उन्हें डर है कि यदि वे कहीं कमजोर पड़े तो कछुए एक बार फिर जीत हासिल कर लेंगे। पंचतंत्र की इस खरगोश और कछुए वाली कहानी से शायद ही कोई भारतीय अपरिचित होगा। पर इसी के साथ मैं अपने साथियों को एक बात और बताना चाहूंगा। एक कथित ब्लागर मित्र (कथित इसलिए कि उसकी गतिविधियों बिलकुल शून्य है, पर अपने सम्पर्कों तक लिंक पहुंचाने में वह चूक नहीं करता, भले ही उसके ब्लाग में सालभर पहले की पोस्ट पड़ी हुई हो।) ने कल ही मुझे बताया कि ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत में जाकर वह लेखों को बिना पढ़े ही टिप्पणी कर रहा है। ...और यह भी कि कई बड़े चिट्ठाकारों पर उसने नकारात्मक और बकवास किस्म की टिप्पणियां की है। (निवेदन है कि इस कथित ब्लागर का नाम न पूछें।) बहरहाल, मैंने इन सज्जन को अपनी और अन्य ब्लागर साथियों की भावनाओं से अवगत करा दिया है और उससे वायदा भी लिया है कि आइंदा वह इस तरह की हरकत नहीं करेगा।
साथियों, ब्लाग जगत में कई ऐसे लोग भी सक्रिय है, जिनका लिखने और पढऩे से कहीं कोई वास्ता नहीं है। ऐसे लोग महज मजा लेने के लिए आते हैं और मजा लेने के लिए उट-पटांग टिप्पणियां और नापसंदगी का चटखा लगा जाते हैं। मैं यह नहीं कहता कि सिर्फ ऐसे ही लोग ब्लाग-सागर को गंदा कर रहे हैं। संभव है कि सक्रिय किस्म के लोग भी ऐसा कर रहे हों, जैसा कि मैंने खरगोश और कछुए की कहानी के माध्यम से बताने का प्रयास किया है। इस बारे में ज्यादा कुछ इसलिए भी नहीं कहूंगा कि मुझे किसी पचड़े में नहीं पडऩा है। मैं एक शुद्ध और बेहतर सोच लेकर आगे बढऩा चाहता हूं। किसी की बुराई कर या व्यर्थ की बातें लिखकर अपने चिट्ठों में टिप्पणियों की संख्या बढ़ाने पर मेरा विश्वास नहीं है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, वे करते हैं।
मंगलवार, 27 अप्रैल 2010
खबरें इधर-उधर की
सफेदा लगाकर बदल डाला
रायगढ़। दिवंगत व्यक्ति के नाम पर तहसीलदार न्यायालय से जारी काम रोको आदेश पर सफेदा लगाकर मृतक के पुत्र के नाम पर आदेश तामिल करा लेने का अजीबो-गरीब मामला सामने आया है। जबकि आदेश तामिली के एक दिन बाद तहसीलदार न्यायालय में संशोधन आदेश हेतु आवेदन लगाया गया।
एक राजस्व प्रकरण में तहसीलदार एस.पी.वैद्य के न्यायालय में रा.प्र.क्र. 522/अ-70/09-10 में काम रोको आदेश पारित किया गया। जिसमें दादू बिल्डर्स के अशोक अग्रवाल के नाम से स्वयं के लेटरपेड में दो रूपये की टिकट लगाकर वैधानिक प्रक्रिया पूर्ण किये बिना ही शीशधर बाजपेयी (मृत व्यक्ति) के विरूद्ध आवेदन पत्र प्रस्तुत कर यह आरोप लगाया गया कि उक्त मृत व्यक्ति द्वारा दादू बिल्डर्स का मार्ग अवरूद्ध कर भूमि पर अतिक्रमण किया जा रहा है। इस तरह निजी व्यक्ति द्वारा निजी लेटरहेड पर लगाए गये आवेदन पर तहसीलदार द्वारा बिना किसी जानकारी लिये अथवा संबंधित अन्य दस्तावेजों का अवलोकन किये ही आवेदन पर काम रोको आदेश जारी कर दिया गया। आदेश की प्रति लेकर दादू बिल्डर्स के कर्मचारी जे.एन. भारद्वाज के साथ तहसील कोर्ट के माल जमादार जब मृतक शीशधर बाजपेयी के पते पर पहुंचे तो उनके पुत्र द्वारा नोटिस को नहीं लेते हुए बताया गया कि यह नोटिस मृत व्यक्ति के नाम पर है जिस पर वापस चले गये किन्तु आधे घंटे बाद उक्त दोनो व्यक्ति एक साथ पुन: वापस आये और शीशधर बाजपेयी वाली नोटिस में शीशधर के नाम के ऊपर सफेदा लगाकर उसमें प्रमोद बाजपेयी लिखकर लाये एवं प्रमोद बाजपेयी को काम रोको आदेश की प्रति थमा दी। जिसमें सफेदा लगे स्थान पर किसी भी अधिकारी के लघु हस्ताक्षर नहीं थे। दस्तावेजों में हेराफेरी एवं कूटरचित दस्तावेजों के होने की शंका के कारण प्रमोद बाजपेयी द्वारा 3 अप्रैल को उक्त प्रकरण के समस्त दस्तावेजों की सत्यापित प्रति प्राप्त की गई जिससे जानकारी हुई कि दादू बिल्डर्स के अशोक अग्रवाल के नाम से पार्टनर के नाम से पार्टनर के रूप में उसके कर्मचारी द्वारा स्वयं उपस्थित होकर आवेदन प्रस्तुत किया गया कि शीशधर बाजपेयी द्वारा उनके आवासीय प्लाट का व्यक्तिगत रास्ता रोककर अतिक्रमण किया जा रहा है। जिस पर तहसीलदार द्वारा काम रोको आदेश जारी कर दिया गया। इसी क्रम में दादू बिल्डर्स के कर्मचारी द्वारा 1 अप्रैल को संशोधन आवेदन प्रस्तुत किया गया जिसमें शीशधर बाजपेयी के नाम के स्थान पर प्रमोद बाजपेयी के नाम पर न्यायालय द्वारा काम रोको आदेश जारी करने का आवेदन लगाया गया किन्तु प्रशासनिक मिली भगत का प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि तहसीलदार के न्यायालय में संशोधन आवेदन 1 अप्रैल को पेश किया गया किन्तु तहसीलदार द्वारा आवेदन लगने के एक दिन पूर्व ही अर्थात 30 मार्च को अपना काम रोको आदेश जारी कर उसकी तामिली भी करवा दी गई। रायगढ़ तहसीलदार के रूप में जब से श्री वैद्य ने पदभार संभाला है, ऐसे विसंगतिपूर्ण आदेशों की शिकायतें आम हो गई है। जिलाधीश ने यदि शीघ्र ऐसे प्रकरणों पर ध्यान न दिया तो रायगढ़ में एक बड़े जमीन घोटाले की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
०००
अस्पताल में पानी के लिए हाहाकार
रायगढ़। शहर में पड़ रही प्रचंड गर्मी के कारण जहां शहर के कई मोहल्लों में पानी की किल्लत हो गई है वहीं जिला चिकित्सालय के अधिकांश बोर खराब हो जाने के कारण यहां पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। जिला चिकित्सालय परिसर में कुल 6 बोर है जिनमें से मात्र दो बोर इस समय चल रहा है इनमें से एक नया बोर जो नये ओपीडी के पास जेएसपीएल द्वारा खुदवाया गया था उसका कनेक्शन नये ओपीडी से जुड़ा होने के कारण शेष वार्डों के लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है इसके अलावा आईसीयू के सामने स्थित बोर चल रहा है जबकि रेडक्रास के सामने, उद्यान के भीतर तथा रेडक्रास दवा दुकान के सामने सहित बाकि बोर बेकार पड़े है जिसके कारण मरीजों के परिजनों को दिन भर बोतल या बाल्टी लेकर पानी के लिए भटकना पड़ता है। आलम यह है कि निस्तारी के लिए पानी तो दूर यहां आने वाले लोग पीने के बुंद-बुंद पानी के लिए तरस रहे है। कुछ मरीजों के परिजनों ने बताया कि दो दिन पहले यहां निगम द्वारा 4 टेंकर पानी आया था इसके बावजूद पानी लोगों को पर्याप्त मात्रा में नहीं मिला। वहीं अब तो टैंकर से पानी भी नहीं आ रहा है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि परिसर में किस कदर पानी की किल्लत है। अस्पताल प्रबंधन से इस संबंध में चर्चा करने पर उनका स्पष्ट जवाब होता है कि जल आपूर्ति तथा बोर का रख-रखाव का जिला पीएचई को सौंपा गया है। वहीं पीएचई द्वारा इन बिगड़े हुए बोर पंपों को सुधारने के लिए कोई त्वरित कार्रवाई न करने से यह समस्या विकराल रूप धार करने लगी है। यदि समय रहते इस समस्या के निदान की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में अस्पताल परिसर के भीतर ही पानी के लिए किसी की जान भी जा सकती है इसलिए जिला प्रशासन तथा कलेक्टर रायगढ़ को अस्पताल की इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए त्वरित कार्रवाई के लिए निर्देशित करने की जरूरत है ताकि अस्पताल के विभिन्न वार्डों में भर्ती मरीज तथा उनके परिजनों को राहत मिल सके।
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गर्मी से उबल रहे मरीज
कवर्धा। स्थानीय जिला चिकित्सालय में मरीजों का हाल इस भीषण गर्मी में बंद से बदत्तर है आवश्यक सुविधाओं की कभी से जुझ रहे मरीजों को अपने बीमार स्वास्थ्य के साथ-साथ इस मौसम में भी दो चार होना पड़ रहा है। गर्मी शुरू होने के पहले अस्पताल प्रबंधन द्वारा बढ़ चढ़कर किये जाते है हम मरीजों को इस गर्मी में विशेष ख्याल रखेंगे उन्हें ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे लेकिन सारे दाने खोखले ही हुए क्योंकि मरीजों को मिलने वाली सुविधाएं अपर्याप्त है मरीजों के साथ परिजनों को भी खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
अप्रैल माह में बढ़ रही भीषण गर्मी से जहां लोग परेशान हो रहे है वहीं अस्पताल में भर्ती मरीज भी हलाकान हो रहे है। गर्म हवाओं के बीच मरीजों को राहत नहीं मिल पा रही है। पंखो व कूलरों की हवा भी बेअसर होने लगी है अस्पताल में कूलर लगभग 8 से 10 है तो बड़े कमरे में लगे हुए है तथा पंखा 35 40 तक है बावजूद इसके तमाम संसाधन मरीजों के लिए अपर्याप्त बने हुए है। अस्पताल में भर्ती मरीजों की बड़ी मुश्किल से शीतल जल उपलब्ध हो रहा है। गर्मी के मौसम में ठंडे पानी के लिए मरीजों एवं उनके परिजनों को इधर उधर भटकना पड़ रहा है। मरीजों को ठंडे पानी उपलब्ध कराने के लिए अस्पताल परिसर में चार पांच मटके रखे गए है लेकिन उसमें भी कभी पानी भरा रहता है तो कभी खाली रहता है। पानी देने वाले भी कोई नहीं रहते। अलग-अलग वार्डो में लगे कूलरों की भी स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है 8 से 10 कूलरों में से 5 -6 कूलर तो ऐसे है जिसमें ठंडी हवा तो नहीं गर्म हवा जरूर मिलती है। बाकी बचे कुलरों में समय सयम पर पानी डालने के लिए यहां कोई नही है। पानी खत्म हो जाने के बाद यही कूलर गर्म हवा के साथ आग उगलना शुरू कर देते है। वार्डो में लगे पंखे सिर्फ देखने भर की है इन पंखो की रफतार इतनी कम है कि इससमे मरीजों को थोड़ी बहूत भी राहत न मिल पा रही है कहले को तो सभी पंखे चालू हालत में है लेकिन हकीकत यही है कि इन पंखो व कुलरों से मरीजों को कुछ ज्यादा लाभ नहीं मिल रहा है। प्रसुति वार्ड में जच्चा बच्चा के लिए इस गर्मी में खास ध्यान देने की जरूरत है लेकिन अस्पताल प्रबंधन द्वारा किए गए उपाए नकामी है महिला वार्ड की स्थिति भी ज्यादा अच्छी नही है। पूरे 24 घंटे मरीजों को अपनी बिमारी के साथ-साथ गर्मी में जूझते असानी से देखा जा सकता है।
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महिला वेशभूषा में संदिग्ध युवक गिरफ्तार
कांकेर। महिला का वेशधारण कर नगर के एक मोहल्ले में चोरी की नियत से रात 2.30 बजे घुम रहे कोलकाता के श्यामली बोस(36)को पुलिस के गश्ती दल ने नागरिकों के सहयोग से दबोच लिया। मिली जानकारी के अनुसार यह व्यक्ति 2.30 बजे एकता नगर में अकेले घुमते चोरी करने महिला वेश में टोह ले रहा था। गश्ती दल को देख वह भागने लगा तब वार्ड के लोगों के सहयोग से उसे दबोच लिया।
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बच्चे भी लोगों की प्यास बुझा रहे
धमतरी। इतवारी बाजार स्थित माँ तुलजा भवानी मंदिर के सामने भीषड़ गर्मी में राहगिरों के लिए शीतल पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है। इस प्याऊ में आसपास के काफी लोगों को काफी राहत मिल रही है वहीं लोगों को पानी देकर प्यास बुझाने में छोटे-छोटे बच्चें खूब रूचि ले रहे है। आज सुबह इन बच्चों के हौसला अफजाई के लिए भाजपा जिलाध्यक्ष महेन्द्र पंडित प्याऊ घर पहुंच कर उन्हें स्नेह देते हुए अच्छे कार्य करने की बधाई दी।
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रायगढ़। दिवंगत व्यक्ति के नाम पर तहसीलदार न्यायालय से जारी काम रोको आदेश पर सफेदा लगाकर मृतक के पुत्र के नाम पर आदेश तामिल करा लेने का अजीबो-गरीब मामला सामने आया है। जबकि आदेश तामिली के एक दिन बाद तहसीलदार न्यायालय में संशोधन आदेश हेतु आवेदन लगाया गया।
एक राजस्व प्रकरण में तहसीलदार एस.पी.वैद्य के न्यायालय में रा.प्र.क्र. 522/अ-70/09-10 में काम रोको आदेश पारित किया गया। जिसमें दादू बिल्डर्स के अशोक अग्रवाल के नाम से स्वयं के लेटरपेड में दो रूपये की टिकट लगाकर वैधानिक प्रक्रिया पूर्ण किये बिना ही शीशधर बाजपेयी (मृत व्यक्ति) के विरूद्ध आवेदन पत्र प्रस्तुत कर यह आरोप लगाया गया कि उक्त मृत व्यक्ति द्वारा दादू बिल्डर्स का मार्ग अवरूद्ध कर भूमि पर अतिक्रमण किया जा रहा है। इस तरह निजी व्यक्ति द्वारा निजी लेटरहेड पर लगाए गये आवेदन पर तहसीलदार द्वारा बिना किसी जानकारी लिये अथवा संबंधित अन्य दस्तावेजों का अवलोकन किये ही आवेदन पर काम रोको आदेश जारी कर दिया गया। आदेश की प्रति लेकर दादू बिल्डर्स के कर्मचारी जे.एन. भारद्वाज के साथ तहसील कोर्ट के माल जमादार जब मृतक शीशधर बाजपेयी के पते पर पहुंचे तो उनके पुत्र द्वारा नोटिस को नहीं लेते हुए बताया गया कि यह नोटिस मृत व्यक्ति के नाम पर है जिस पर वापस चले गये किन्तु आधे घंटे बाद उक्त दोनो व्यक्ति एक साथ पुन: वापस आये और शीशधर बाजपेयी वाली नोटिस में शीशधर के नाम के ऊपर सफेदा लगाकर उसमें प्रमोद बाजपेयी लिखकर लाये एवं प्रमोद बाजपेयी को काम रोको आदेश की प्रति थमा दी। जिसमें सफेदा लगे स्थान पर किसी भी अधिकारी के लघु हस्ताक्षर नहीं थे। दस्तावेजों में हेराफेरी एवं कूटरचित दस्तावेजों के होने की शंका के कारण प्रमोद बाजपेयी द्वारा 3 अप्रैल को उक्त प्रकरण के समस्त दस्तावेजों की सत्यापित प्रति प्राप्त की गई जिससे जानकारी हुई कि दादू बिल्डर्स के अशोक अग्रवाल के नाम से पार्टनर के नाम से पार्टनर के रूप में उसके कर्मचारी द्वारा स्वयं उपस्थित होकर आवेदन प्रस्तुत किया गया कि शीशधर बाजपेयी द्वारा उनके आवासीय प्लाट का व्यक्तिगत रास्ता रोककर अतिक्रमण किया जा रहा है। जिस पर तहसीलदार द्वारा काम रोको आदेश जारी कर दिया गया। इसी क्रम में दादू बिल्डर्स के कर्मचारी द्वारा 1 अप्रैल को संशोधन आवेदन प्रस्तुत किया गया जिसमें शीशधर बाजपेयी के नाम के स्थान पर प्रमोद बाजपेयी के नाम पर न्यायालय द्वारा काम रोको आदेश जारी करने का आवेदन लगाया गया किन्तु प्रशासनिक मिली भगत का प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि तहसीलदार के न्यायालय में संशोधन आवेदन 1 अप्रैल को पेश किया गया किन्तु तहसीलदार द्वारा आवेदन लगने के एक दिन पूर्व ही अर्थात 30 मार्च को अपना काम रोको आदेश जारी कर उसकी तामिली भी करवा दी गई। रायगढ़ तहसीलदार के रूप में जब से श्री वैद्य ने पदभार संभाला है, ऐसे विसंगतिपूर्ण आदेशों की शिकायतें आम हो गई है। जिलाधीश ने यदि शीघ्र ऐसे प्रकरणों पर ध्यान न दिया तो रायगढ़ में एक बड़े जमीन घोटाले की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
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अस्पताल में पानी के लिए हाहाकार
रायगढ़। शहर में पड़ रही प्रचंड गर्मी के कारण जहां शहर के कई मोहल्लों में पानी की किल्लत हो गई है वहीं जिला चिकित्सालय के अधिकांश बोर खराब हो जाने के कारण यहां पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। जिला चिकित्सालय परिसर में कुल 6 बोर है जिनमें से मात्र दो बोर इस समय चल रहा है इनमें से एक नया बोर जो नये ओपीडी के पास जेएसपीएल द्वारा खुदवाया गया था उसका कनेक्शन नये ओपीडी से जुड़ा होने के कारण शेष वार्डों के लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है इसके अलावा आईसीयू के सामने स्थित बोर चल रहा है जबकि रेडक्रास के सामने, उद्यान के भीतर तथा रेडक्रास दवा दुकान के सामने सहित बाकि बोर बेकार पड़े है जिसके कारण मरीजों के परिजनों को दिन भर बोतल या बाल्टी लेकर पानी के लिए भटकना पड़ता है। आलम यह है कि निस्तारी के लिए पानी तो दूर यहां आने वाले लोग पीने के बुंद-बुंद पानी के लिए तरस रहे है। कुछ मरीजों के परिजनों ने बताया कि दो दिन पहले यहां निगम द्वारा 4 टेंकर पानी आया था इसके बावजूद पानी लोगों को पर्याप्त मात्रा में नहीं मिला। वहीं अब तो टैंकर से पानी भी नहीं आ रहा है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि परिसर में किस कदर पानी की किल्लत है। अस्पताल प्रबंधन से इस संबंध में चर्चा करने पर उनका स्पष्ट जवाब होता है कि जल आपूर्ति तथा बोर का रख-रखाव का जिला पीएचई को सौंपा गया है। वहीं पीएचई द्वारा इन बिगड़े हुए बोर पंपों को सुधारने के लिए कोई त्वरित कार्रवाई न करने से यह समस्या विकराल रूप धार करने लगी है। यदि समय रहते इस समस्या के निदान की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में अस्पताल परिसर के भीतर ही पानी के लिए किसी की जान भी जा सकती है इसलिए जिला प्रशासन तथा कलेक्टर रायगढ़ को अस्पताल की इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए त्वरित कार्रवाई के लिए निर्देशित करने की जरूरत है ताकि अस्पताल के विभिन्न वार्डों में भर्ती मरीज तथा उनके परिजनों को राहत मिल सके।
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गर्मी से उबल रहे मरीज
कवर्धा। स्थानीय जिला चिकित्सालय में मरीजों का हाल इस भीषण गर्मी में बंद से बदत्तर है आवश्यक सुविधाओं की कभी से जुझ रहे मरीजों को अपने बीमार स्वास्थ्य के साथ-साथ इस मौसम में भी दो चार होना पड़ रहा है। गर्मी शुरू होने के पहले अस्पताल प्रबंधन द्वारा बढ़ चढ़कर किये जाते है हम मरीजों को इस गर्मी में विशेष ख्याल रखेंगे उन्हें ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे लेकिन सारे दाने खोखले ही हुए क्योंकि मरीजों को मिलने वाली सुविधाएं अपर्याप्त है मरीजों के साथ परिजनों को भी खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
अप्रैल माह में बढ़ रही भीषण गर्मी से जहां लोग परेशान हो रहे है वहीं अस्पताल में भर्ती मरीज भी हलाकान हो रहे है। गर्म हवाओं के बीच मरीजों को राहत नहीं मिल पा रही है। पंखो व कूलरों की हवा भी बेअसर होने लगी है अस्पताल में कूलर लगभग 8 से 10 है तो बड़े कमरे में लगे हुए है तथा पंखा 35 40 तक है बावजूद इसके तमाम संसाधन मरीजों के लिए अपर्याप्त बने हुए है। अस्पताल में भर्ती मरीजों की बड़ी मुश्किल से शीतल जल उपलब्ध हो रहा है। गर्मी के मौसम में ठंडे पानी के लिए मरीजों एवं उनके परिजनों को इधर उधर भटकना पड़ रहा है। मरीजों को ठंडे पानी उपलब्ध कराने के लिए अस्पताल परिसर में चार पांच मटके रखे गए है लेकिन उसमें भी कभी पानी भरा रहता है तो कभी खाली रहता है। पानी देने वाले भी कोई नहीं रहते। अलग-अलग वार्डो में लगे कूलरों की भी स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है 8 से 10 कूलरों में से 5 -6 कूलर तो ऐसे है जिसमें ठंडी हवा तो नहीं गर्म हवा जरूर मिलती है। बाकी बचे कुलरों में समय सयम पर पानी डालने के लिए यहां कोई नही है। पानी खत्म हो जाने के बाद यही कूलर गर्म हवा के साथ आग उगलना शुरू कर देते है। वार्डो में लगे पंखे सिर्फ देखने भर की है इन पंखो की रफतार इतनी कम है कि इससमे मरीजों को थोड़ी बहूत भी राहत न मिल पा रही है कहले को तो सभी पंखे चालू हालत में है लेकिन हकीकत यही है कि इन पंखो व कुलरों से मरीजों को कुछ ज्यादा लाभ नहीं मिल रहा है। प्रसुति वार्ड में जच्चा बच्चा के लिए इस गर्मी में खास ध्यान देने की जरूरत है लेकिन अस्पताल प्रबंधन द्वारा किए गए उपाए नकामी है महिला वार्ड की स्थिति भी ज्यादा अच्छी नही है। पूरे 24 घंटे मरीजों को अपनी बिमारी के साथ-साथ गर्मी में जूझते असानी से देखा जा सकता है।
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महिला वेशभूषा में संदिग्ध युवक गिरफ्तार
कांकेर। महिला का वेशधारण कर नगर के एक मोहल्ले में चोरी की नियत से रात 2.30 बजे घुम रहे कोलकाता के श्यामली बोस(36)को पुलिस के गश्ती दल ने नागरिकों के सहयोग से दबोच लिया। मिली जानकारी के अनुसार यह व्यक्ति 2.30 बजे एकता नगर में अकेले घुमते चोरी करने महिला वेश में टोह ले रहा था। गश्ती दल को देख वह भागने लगा तब वार्ड के लोगों के सहयोग से उसे दबोच लिया।
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बच्चे भी लोगों की प्यास बुझा रहे
धमतरी। इतवारी बाजार स्थित माँ तुलजा भवानी मंदिर के सामने भीषड़ गर्मी में राहगिरों के लिए शीतल पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है। इस प्याऊ में आसपास के काफी लोगों को काफी राहत मिल रही है वहीं लोगों को पानी देकर प्यास बुझाने में छोटे-छोटे बच्चें खूब रूचि ले रहे है। आज सुबह इन बच्चों के हौसला अफजाई के लिए भाजपा जिलाध्यक्ष महेन्द्र पंडित प्याऊ घर पहुंच कर उन्हें स्नेह देते हुए अच्छे कार्य करने की बधाई दी।
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सोमवार, 26 अप्रैल 2010
खबरें इधर-उधर की
सरकारी एम्बुलेंस में बारात
कांकेर। सरकारी एम्बुलेंस में बाराती ले जाने का मामला प्रकाश में आया है। जिसकी शिकायत करने चारामा वाहन चालक संघ आज स्वास्थ्य अधिकारी को किये जाने के बाद कांकेर में शिकायत दर्ज कराई।
वाहन चालक संघ के सदस्यों ने अपनी शिकायत में बताया कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र चारामा की नई सुमो(एम्बुलेन्स)के चालक लक्ष्मण सलाम ने 24 अप्रेल को ग्राम रतेसरा से बारातियो को कोडेगांव जिला धमतरी ले जाया गया है। जिस पर वाहन चालक संघ के अध्यक्ष शंकरपुरी गोस्वामी ने आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि एम्बुलेंस वाहन यदि बाराती ढोते रहेंगे तो बीमार मरीजों का क्या होगा? साथ ही बाकी हम गरीब वाहन चालकों का क्या होगा? बारात ले जाते समय जानकारी मिलने पर वाहन चालक संघ द्वारा चालक लक्ष्मण को मना करने पर उसके द्वारा अपशब्द कहा गया तथा जहां शिकायत करना है कर लो कह कर धमकी देते हुउए एम्बुलेंस में बाराती बिठाकर रवाना हो गया। वाहन चालक संघ ने चालक लक्ष्मण सलाम पर उचित कार्यवाही किए जाने की मांग स्वास्थ्य विभाग से की है।
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क्रिकेट बैट से पीट-पीटकर पत्नी की हत्या
रायगढ़। शराब के नशे में पत्नी से विवाद होने पर एक व्यक्ति ने क्रिकेट बैट से पीट-पीटकर उसे मौत के घाट उतार डाला। घटना सुबह मिट्ठुमुड़ा सारथी मोहल्ले में घटित हुई। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है।
जानकारी के अनुसार जूट मिल चौकी अंतर्गत मिट्ठुमुड़ा सारथी मोहल्ला निवासी मंगल सारथी उम्र 32 वर्ष का सुबह करीब 11 बजे अपनी पत्नी गीता बाई से विवाद हो गया। बताया जाता है कि मंगल आदतन शराबी है और जो कुछ कमाता है पीने में उड़ा देता है जिसके कारण गीता बाई गली-मोहल्ले घुम-घुमकर कबाड़ का सामान इकट्ठा कर उसे बेचकर अपने चार बच्चों सहित परिवार का भरण पोषण करती थी। पिछले दिनों मंगल सारथी की बहन के घर में मेहमान आने पर गीता बाई और मंगल में कमाकर लाने को लेकर विवाद हुआ था। इसी क्रम में सुबह जब मंगल शराब पीकर घर लौटा तो गीता बाई अपने पति को खरी-खोटी सुनाने लगी जिस बात को लेकर पति-पत्नी में विवाद शुरू हो गया और विवाद बढऩे पर आक्रोशित होकर मंगल घर में रखे क्रिकेट बैट से गीता के सिर पर ताबड़तोड़ प्राणघातक हमला कर दिया जिससे मौके पर ही गीता बाई की मौत हो गई। घटना की जानकारी मिलने पर तत्काल पुलिस मौके पर पहुंची और मर्ग पंचनामा कार्रवाई पश्चात शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाते हुए भादवि की धारा 302 के तहत आरोपी पति को गिरफ्तार कर लिया है।
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घायल को भी नहीं बख्शा
रायपुर। शहर के हृदय स्थल जयस्तंभ चौक में घायल अवस्था में पड़े एक व्यक्ति के जेब से किसी ने 6 हजार रुपए नगद सहित मोबाइल फोन पार कर दिया।
पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कोटा निवासी अब्दुल रहीम का पुत्र अब्दुल शकील 30 वर्ष टिफिन सेंटर चलाता है। रोज की तरह वह कल रात भी अपनी मोटर साइकिल से रात करीब 10 बजे टिफिन बांटने निकला था। लेकिन रात भर वह घर नहीं लौटा। सुबह परिजनों को खबर मिली कि अब्दुल शकील सड़क हादसे में घायल होकर अम्बेडकर अस्पताल में भर्ती है। घबराए परिजन जब अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि गोलबाजार की पेट्रोलिंग पार्टी ने उसे जयस्तंभ चौक में घायल अवस्था में पड़े देखा और अस्पताल में भर्ती कराया। परिजनों ने बताया कि शकील के सिर व पिछले हिस्से में चोट के निशान हैं जिससे लगता है कि किसी ने उस पर हमला किया है। परिजनों ने यह भी आरोप लगाया है कि शकील जब घर से निकला था तो उसकी जेब में 6 हजार रुपए नगद सहित मोबाइल फोन भी था, जो उसकी जेब से गायब हो चुका है। समाचार लिखे जाने तक घायल शकील को होश नहीं आया था, इधर पुलिस ने उसके होश में आने के बाद बयान दर्ज करने की बात कही है।
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नहीं बदली तांगेवालों की जिंदगी
दुर्ग। निरंतर बदलते समय के साथ शहर की प्रगति के भी कई पन्ने बदल गए। किंतु दुर्ग शहर के आधा सैकड़ा के आसपास टांगेवालों का जीवन आज भी उसी ढर्रे पर चल रहा है। बदलाव के नाम पर पारंपरिक पेशे से विमुख होती नई पीढ़ी, सतत सिमटता जा रहा कमाई का जरिया और तांगे गाड़ी के लकड़ी के पहिये की जगह मोटर गाडिय़ों के पहियों का इस्तेमाल को ही इस कुनबे की उपलब्धि कहा जा सकता है। सुरसा की तरह बढ़ती महंगाई के इस युग में टांगे वाले किसी तरह अपने परिवार का पेंट पाल रहे हैँ। मोटर गाड़ी के जमाने में तांगे वालों की जीविका बचाए रखने पिछले दिनों जिला कलेक्टर ठाकुर रामसिंह ने इंदिरा मार्केट की कुछ प्रमुख सड़कों को टांगेवालों के लिए सुरक्षित घोषित किया है।
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कांकेर। सरकारी एम्बुलेंस में बाराती ले जाने का मामला प्रकाश में आया है। जिसकी शिकायत करने चारामा वाहन चालक संघ आज स्वास्थ्य अधिकारी को किये जाने के बाद कांकेर में शिकायत दर्ज कराई।
वाहन चालक संघ के सदस्यों ने अपनी शिकायत में बताया कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र चारामा की नई सुमो(एम्बुलेन्स)के चालक लक्ष्मण सलाम ने 24 अप्रेल को ग्राम रतेसरा से बारातियो को कोडेगांव जिला धमतरी ले जाया गया है। जिस पर वाहन चालक संघ के अध्यक्ष शंकरपुरी गोस्वामी ने आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि एम्बुलेंस वाहन यदि बाराती ढोते रहेंगे तो बीमार मरीजों का क्या होगा? साथ ही बाकी हम गरीब वाहन चालकों का क्या होगा? बारात ले जाते समय जानकारी मिलने पर वाहन चालक संघ द्वारा चालक लक्ष्मण को मना करने पर उसके द्वारा अपशब्द कहा गया तथा जहां शिकायत करना है कर लो कह कर धमकी देते हुउए एम्बुलेंस में बाराती बिठाकर रवाना हो गया। वाहन चालक संघ ने चालक लक्ष्मण सलाम पर उचित कार्यवाही किए जाने की मांग स्वास्थ्य विभाग से की है।
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क्रिकेट बैट से पीट-पीटकर पत्नी की हत्या
रायगढ़। शराब के नशे में पत्नी से विवाद होने पर एक व्यक्ति ने क्रिकेट बैट से पीट-पीटकर उसे मौत के घाट उतार डाला। घटना सुबह मिट्ठुमुड़ा सारथी मोहल्ले में घटित हुई। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है।
जानकारी के अनुसार जूट मिल चौकी अंतर्गत मिट्ठुमुड़ा सारथी मोहल्ला निवासी मंगल सारथी उम्र 32 वर्ष का सुबह करीब 11 बजे अपनी पत्नी गीता बाई से विवाद हो गया। बताया जाता है कि मंगल आदतन शराबी है और जो कुछ कमाता है पीने में उड़ा देता है जिसके कारण गीता बाई गली-मोहल्ले घुम-घुमकर कबाड़ का सामान इकट्ठा कर उसे बेचकर अपने चार बच्चों सहित परिवार का भरण पोषण करती थी। पिछले दिनों मंगल सारथी की बहन के घर में मेहमान आने पर गीता बाई और मंगल में कमाकर लाने को लेकर विवाद हुआ था। इसी क्रम में सुबह जब मंगल शराब पीकर घर लौटा तो गीता बाई अपने पति को खरी-खोटी सुनाने लगी जिस बात को लेकर पति-पत्नी में विवाद शुरू हो गया और विवाद बढऩे पर आक्रोशित होकर मंगल घर में रखे क्रिकेट बैट से गीता के सिर पर ताबड़तोड़ प्राणघातक हमला कर दिया जिससे मौके पर ही गीता बाई की मौत हो गई। घटना की जानकारी मिलने पर तत्काल पुलिस मौके पर पहुंची और मर्ग पंचनामा कार्रवाई पश्चात शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाते हुए भादवि की धारा 302 के तहत आरोपी पति को गिरफ्तार कर लिया है।
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घायल को भी नहीं बख्शा
रायपुर। शहर के हृदय स्थल जयस्तंभ चौक में घायल अवस्था में पड़े एक व्यक्ति के जेब से किसी ने 6 हजार रुपए नगद सहित मोबाइल फोन पार कर दिया।
पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कोटा निवासी अब्दुल रहीम का पुत्र अब्दुल शकील 30 वर्ष टिफिन सेंटर चलाता है। रोज की तरह वह कल रात भी अपनी मोटर साइकिल से रात करीब 10 बजे टिफिन बांटने निकला था। लेकिन रात भर वह घर नहीं लौटा। सुबह परिजनों को खबर मिली कि अब्दुल शकील सड़क हादसे में घायल होकर अम्बेडकर अस्पताल में भर्ती है। घबराए परिजन जब अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि गोलबाजार की पेट्रोलिंग पार्टी ने उसे जयस्तंभ चौक में घायल अवस्था में पड़े देखा और अस्पताल में भर्ती कराया। परिजनों ने बताया कि शकील के सिर व पिछले हिस्से में चोट के निशान हैं जिससे लगता है कि किसी ने उस पर हमला किया है। परिजनों ने यह भी आरोप लगाया है कि शकील जब घर से निकला था तो उसकी जेब में 6 हजार रुपए नगद सहित मोबाइल फोन भी था, जो उसकी जेब से गायब हो चुका है। समाचार लिखे जाने तक घायल शकील को होश नहीं आया था, इधर पुलिस ने उसके होश में आने के बाद बयान दर्ज करने की बात कही है।
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नहीं बदली तांगेवालों की जिंदगी
दुर्ग। निरंतर बदलते समय के साथ शहर की प्रगति के भी कई पन्ने बदल गए। किंतु दुर्ग शहर के आधा सैकड़ा के आसपास टांगेवालों का जीवन आज भी उसी ढर्रे पर चल रहा है। बदलाव के नाम पर पारंपरिक पेशे से विमुख होती नई पीढ़ी, सतत सिमटता जा रहा कमाई का जरिया और तांगे गाड़ी के लकड़ी के पहिये की जगह मोटर गाडिय़ों के पहियों का इस्तेमाल को ही इस कुनबे की उपलब्धि कहा जा सकता है। सुरसा की तरह बढ़ती महंगाई के इस युग में टांगे वाले किसी तरह अपने परिवार का पेंट पाल रहे हैँ। मोटर गाड़ी के जमाने में तांगे वालों की जीविका बचाए रखने पिछले दिनों जिला कलेक्टर ठाकुर रामसिंह ने इंदिरा मार्केट की कुछ प्रमुख सड़कों को टांगेवालों के लिए सुरक्षित घोषित किया है।
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